आज का शब्द: मेरु और महादेवी वर्मा की कविता-मैं न यह पथ जानती री!
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मेरु, जिसका अर्थ है- पुराणों में वर्णित एक पर्वत जो सोने का कहा गया है, सुमेरु। प्रस्तुत है महादेवी वर्मा की कविता- मैं न यह पथ जानती री! मैं न यह पथ जानती री! धर्म हों विद्युत् शिखायें, अश्रु भले बे आज अग-जग वेदना की घन-घटायें! सिहरता मेरा न लघु उर, काँपते पग भी न मृदुतर, सुरभिमय पथ में सलोने स्वजन को पहचानती री! ज्वाल के हों सिन्धु तरलित, तुहिन-विजडित मेरु शत-शत, पार कर लूँगी वही पग-चाप यदि कर दें निमंत्रित नाप लेगा नभ विहग-मन बाँध लेगा प्रलय मृदु तन, किसलिये ये फूल-सोदर शूल आज बखानती री हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 18, 2026, 17:03 IST
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