आज का शब्द: स्पृश्य और सुमित्रानंदन पंत की कविता- खोलो, मुख से घूँघट
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- स्पृश्य, जिसका अर्थ है- स्पर्श करने के योग्य, छूने लायक। प्रस्तुत है सुमित्रानंदन पंत की कविता- खोलो, मुख से घूँघट खोलो, मुख से घूँघट खोलो, हे चिर अवगुंठनमयि, बोलो! क्या तुम केवल चिर-अवगुंठन, अथवा भीतर जीवन-कम्पन कल्पना मात्र मृदु देह-लता, पा ऊर्ध्व ब्रह्म, माया विनता! है स्पृश्य, स्पर्श का नहीं पता, है दृश्य, दृष्टि पर सके बता! पट पर पट केवल तम अपार, पट पर पट खुले, न मिला पार! सखि, हटा अपरिचय-अंधकार खोलो रहस्य के मर्म द्वार! मैं हार गया तह छील-छील, आँखों से प्रिय छबि लील-लील, मैं हूँ या तुम यह कैसा छ्ल! या हम दोनों, दोनों के बल तुम में कवि का मन गया समा, तुम कवि के मन की हो सुषमा; हम दो भी हैं या नित्य एक तब कोई किसको सके देख ओ मौन-चिरन्तन, तम-प्रकाश, चिर अवचनीय, आश्चर्य-पाश! तुम अतल गर्त, अविगत, अकूल, फैली अनन्त में बिना मूल! अज्ञेय गुह्य अग-जग छाई, माया, मोहिनि, सँग-सँग आई! तुम कुहुकिनि, जग की मोह-निशा, मैं रहूँ सत्य, तुम रहो मृषा! हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 05, 2026, 16:46 IST
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