मुद्दा: अब हिमालय भी हांफ रहा है, बर्फ की गहराई में 30 से 40% तक की कमी

दिल्ली जैसे महानगरों की प्रदूषित हवा लोगों के स्वास्थ्य को तो नुकसान पहुंचा ही रही है, इन हवाओं का प्रदूषण हिमालय को भी बीमार कर रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों से उठने वाला वायु प्रदूषण सीमाओं को लांघकर हिमालय तक पहुंच रहा है। यह सीमापार प्रदूषण (ट्रांसबाउंडरी पॉल्यूशन) न केवल हिमालयी हिमनदों के पिघलने की गति को तेज कर रहा है, बल्कि पूरे क्षेत्र के जलवायु चक्रों को भी प्रभावित कर रहा है। काठमांडो स्थित आईसीमोड, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे तथा नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एरीज) के अध्ययनों के अनुसार, ब्लैक कार्बन हिमालयी बर्फ पर जमकर उसके परावर्तन गुण (एल्बीडो) को 20 से 30 फीसदी तक कम कर देता है। इससे सूर्य की अधिक ऊर्जा बर्फ द्वारा अवशोषित होने के कारण हिमनदों के पिघलने की दर तेज हो जाती है और हिमानी झील विस्फोट की घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। ब्लैक कार्बन वह सूक्ष्म कण है, जो डीजल, कोयला, लकड़ी और अन्य जैव ईंधनों के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होता है। इसका आकार ढाई माइक्रोमीटर से भी कम होता है, जिससे यह लंबे समय तक वायुमंडल में बना रहता है और श्वसन के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच जाता है। आईआईटी, दिल्ली व कानपुर और टेरी के अध्ययनों के मुताबिक, दिल्ली जैसे महानगरों में ब्लैक कार्बन, पीएम 2.5 प्रदूषण का 10 से 30 प्रतिशत तक हिस्सा बनाता है। 2013 से 2023 तक के दशकीय विश्लेषण से यह भी सामने आया है कि केंद्रीय सिंधु-गंगा मैदान में ब्लैक कार्बन की औसत सांद्रता पांच से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहती है, जो सर्दियों में लगभग दोगुनी हो जाती है। आईआईटीएम और अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन के विश्लेषण के मुताबिक, नगरों से उठने वाले वायु द्रव्यमानों का 23 से 40 प्रतिशत हिस्सा हिमालयी जगहों तक पहुंचता है। धूल भरी आंधियां इस प्रक्रिया को और तेज कर देती हैं। आईसीमोड, स्विट्जरलैंड के ईटीएच ज्यूरिख और वाडिया संस्थान के अध्ययनों में पाया गया कि केंद्रीय व पश्चिमी हिमालय में ब्लैक कार्बन का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा जीवाश्म ईंधनों से आता है। वहीं, नासा के अनुसार, ब्लैक कार्बन की एक पतली परत भी बर्फ के एल्बीडो को पांच से 10 प्रतिशत तक घटा देती है, जिससे सतह का तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। आईसीमोड के 2025 के अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ब्लैक कार्बन की बढ़ती सांद्रता के कारण बर्फ की गहराई में 30 से 40 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है। विश्व बैंक व आईसीमोड के अनुसार, ब्लैक कार्बन हिमनदों की वापसी को 20 से 25 प्रतिशत तक तेज कर रहा है, जिससे गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जल प्रवाह में अस्थिरता बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि दक्षिण एशियाई देश उत्सर्जन मानकों को सख्ती से लागू करें, तो हिमालयी हिमनदों पर ब्लैक कार्बन का निक्षेपण लगभग 23 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यूएनईपी के अनुसार, स्वच्छ ईंधनों का उपयोग, विद्युत वाहनों को बढ़ावा देकर और फसल अवशेष जलाने पर नियंत्रण से ब्लैक कार्बन उत्सर्जन को 50 से 80 फीसदी तक घटाया जा सकता है। हिमालय, जिसे एशिया का जलस्तंभ कहा जाता है, को बचाने के लिए क्षेत्रीय सहयोग अब अनिवार्य हो गया है। आईसीमोड के अनुसार, ब्लैक कार्बन के अनियंत्रित उत्सर्जन से वर्ष 2050 तक हिमालयी बर्फ का 30 से 40 फीसदी हिस्सा नष्ट हो सकता है। शहरी प्रदूषण की यह छाया अब हिमालय की चोटियों पर गहरी होती जा रही है और समय रहते हस्तक्षेप ही इसका एकमात्र समाधान है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 17, 2026, 06:37 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




मुद्दा: अब हिमालय भी हांफ रहा है, बर्फ की गहराई में 30 से 40% तक की कमी #Opinion #Scientists #AirPollution #Himalaya #Himalayas #SubahSamachar