अनंत चतुर्दशी 2026: आज इस विधि से करें भगवान विष्णु की पूजा, जानें व्रत के नियम और पौराणिक कथा
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों में इस दिन व्रत रखने के साथ ही भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का विधान बताया गया है। अनंत चतुर्दशी की पूजा में अनंत सूत्र का विशेष महत्व है। यह सूत्र सूत के धागे को हल्दी में भिगोकर 14 गांठ लगाकर तैयार किया जाता है। इसे हाथ या गले में धारण किया जाता है। मान्यता है कि इस अनंत सूत्र को धारण करने से व्यक्ति सभी प्रकार के कष्टों से दूर रहता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक इस दिन श्रीहरि की पूजा करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। इसी दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है, जिसके चलते इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। ये है पूजा का विधान इस दिन कलश स्थापना करके उस पर सुंदर लोटे में कुश रखना चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने केसर, रोली और हल्दी से रंगे हुए सूत के डोरे रखें और उनकी गंध, पुष्प, अक्षत, धूप-दीप आदि से पूजा करें। इसके बाद मिष्ठान आदि का भोग लगाएं और अनंत भगवान का ध्यान करते हुए सूत्र धारण करें। यह डोरा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देने वाला माना गया है। इस दिन श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करना भी बहुत उत्तम माना जाता है। कई लोग घरों में सत्यनारायण भगवान की कथा और हरि नाम का कीर्तन भी करवाते हैं। कब है अनंत चतुर्दशी, जानिए सही तिथि, पूजा विधि और गणेश विसर्जन का शुभ मुहूर्त अनंत चतुर्दशी व्रत के नियम अनंत चतुर्दशी के व्रत में श्रद्धालु को पूरे दिन सात्विकता और संयम का पालन करना चाहिए। व्रत रखने वाले व्यक्ति को क्रोध, विवाद और नकारात्मक विचारों से बचते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। भोजन ग्रहण करने वाले श्रद्धालु सात्विक आहार लेते हैं और मांसाहार, नशे तथा तामसिक भोजन से परहेज करते हैं। इस दिन सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान देना और ब्राह्मणों को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है। व्रत का संकल्प श्रद्धा के साथ लेकर उसका पालन करना चाहिए और दिनभर भगवान विष्णु के नाम का जाप एवं धार्मिक कथा का श्रवण करना पुण्यदायी माना जाता है। गणपति बप्पा मोरया: अनंत चतुर्दशी पर कब और कैसे करें गणेश विसर्जन, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि जब पांडवों के हुए कष्ट दूर महाभारत की एक कथा के अनुसार, जब कौरवों ने छल से जुए में पांडवों को हरा दिया था, इसके बाद पांडवों को अपना राजपाट त्यागकर वनवास जाना पड़ा। वहां उन्होंने बहुत कष्ट उठाए। ऐसे में जब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने वन आए तो युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि इस पीड़ा से निकलने और दोबारा राजपाट प्राप्त करने का क्या उपाय है। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि आप सभी भाई पत्नी समेत भाद्र शुक्ल चतुर्दशी का व्रत रखें और अनंत भगवान की पूजा करें। इस पर युधिष्ठिर ने अनंत भगवान के बारे में जिज्ञासा प्रकट की तो कृष्ण जी ने कहा कि वह भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं। चतुर्मास में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं। इनके आदि और अंत का पता नहीं है, इसीलिए ये अनंत कहलाते हैं। इनके पूजन से आपके सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे। तब युधिष्ठिर ने परिवार सहित यह व्रत किया और उन्हें पुन: हस्तिनापुर का राज-पाट प्राप्त हुआ। मान्यता है कि तभी से अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और व्रत करने की परंपरा चली आ रही है। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Sep 24, 2026, 18:01 IST
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