अमेरिका में वीजा का एक पहलू यह भी: जेडी वेंस की बात अपमानजनक, लेकिन जिस निर्भरता की ओर इशारा किया, वह असली
हम में से ज्यादातर लोग ऐसे किसी परिवार को जानते हैं, जिनका बेटा या बेटी पंद्रह साल पहले एच-1बी पर अमेरिका गए, अच्छा काम किया, घर खरीदा, उनके बच्चे हुए, जो अमेरिकी लहजे में बोलते हैं। और, वे आज भी ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं। पिछले हफ्ते जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने विदेशी टेक कर्मचारियों को 'गिरमिटिया मजदूर' कहा, तो उन्हीं परिवारों का खयाल आया। विदेश मंत्रालय ने इसे बेहद आपत्तिजनक बताया, जो था भी। हमारे लोगों को इसी व्यवस्था के तहत जहाजों में भरकर फिजी, मॉरीशस और कैरिबियन देशों में भेजा गया था। भारतीयों के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हल्के-फुल्के अंदाज में नहीं किया जाना चाहिए। यह याद रखना जरूरी है कि वाशिंगटन की बातें पहले काफी अलग हुआ करती थीं। अप्रैल 2005 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक प्रस्ताव के जरिये अमेरिकी समाज में भारतीय अमेरिकियों के योगदान को मान्यता दी। प्रस्ताव में एक समूह का नाम लेकर जिक्र था: आईआईटी के स्नातक, जिन्हें उनके आर्थिक नवाचार के लिए सम्मानित किया गया। 21 साल बाद, उसी तरह का इंजीनियर 'गिरमिटिया मजदूर' हो गया है। आईआईटी आज भी वैसे ही स्नातक तैयार कर रहे हैं। बदली है तो सिर्फ अमेरिका की राजनीति। आठ अक्तूबर को अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पर्म) से निलंबित कर दिया, जो नियोक्ता-प्रायोजित ग्रीन कार्ड की दिशा में पहला कदम है। इस सूची में टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएलटेक और कॉग्निजेट हैं। माइक्रोसॉफ्ट व एडोबी भी हैं। किसी का एच-1बी वीजा रद्द नहीं हुआ है, लेकिन जो इन कंपनियों में काम करते हैं, उनके लिए अस्थायी वीजा से स्थायी निवास तक का मार्ग अब बंद है। यह अचानक नहीं हुआ। पिछले साल नई एच-1बी याचिकाओं पर 1,00,000 डॉलर का शुल्क लगा था। अब विश्वविद्यालयों से उन विदेशी स्नातकों के बारे में सवाल पूछे जा रहे हैं, जिन्हें वे नौकरी देते हैं। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव कुछ ही हफ्ते दूर हैं। इसलिए नहीं लगता कि इन फैसलों को वापस लिया जाएगा। भले ही सुनने में यह खराब लगे, पर लंबी अवधि में भारत के लिए बेहतर यही है कि एच-1बी का विकल्प ही न रहे। एच-1बी उसे रखने वाले के लिए कभी अच्छा सौदा नहीं था। अमेरिका में रहने का अधिकार नियोक्ता के हाथों में होता है। हर देश के लिए तय सीमा के कारण एक भारतीय को ग्रीन कार्ड के लिए दशकों इंतजार करना पड़ सकता है। इन तमाम वर्षों में वे वेतन बढ़ाने की मांग करने, नौकरी बदलने या अपना उद्यम शुरू करने से पहले दो बार सोचते हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के शब्द अपमानजनक थे, पर वह जिस निर्भरता की ओर इशारा कर रहे थे, वह असली है। एच-1बी की कीमत देश ने भी चुकाई है। वाशिंगटन के साथ हर बातचीत में यह वीजा हमारी समस्या बन जाता है, चाहे टैरिफ हो, रूसी तेल हो या बाजार तक पहुंच। अमेरिकी जानते हैं कि लाखों भारतीय परिवार इसे लेकर चिंतित हैं। देश में अब 1,700 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर हैं। नैसकॉम का कहना है कि भारतीय आईटी कंपनियां पहले ही एच-1बी का इस्तेमाल घटा चुकी थीं और अमेरिकियों को नौकरी दे रही थीं। अगर कोई कंपनी इंजीनियर को सिएटल नहीं ले जा सकती, तो वह काम को उसके पास ले आएगी। फिर वह यहीं टैक्स देगा, यहीं वेतन खर्च करेगा, और अपने जूनियरों को सिखाएगा। उनमें से कुछ नौकरी छोड़कर कंपनियां शुरू करेंगे। उद्योग ऐसे ही बढ़ता है। ताइवान में चिप उद्योग खड़ा करने वालों में बहुत से वही थे, जो लौटकर आए। वे मातृभूमि के प्रेम में नहीं, बल्कि इसलिए लौटे, क्योंकि घर पर करने लायक काम था। बेशक इससे अमेरिका से आने वाले रेमिटेंस में कमी होगी। बहुत-से भारतीय स्टार्टअप उन लोगों ने शुरू किए या उनमें पैसा लगाया, जिन्होंने अमेरिका में दस साल बिताए थे। वह कमी भी हमें महसूस होगी। जहां तक उस परिवार की बात है, जो ग्रीन कार्ड आवेदन के बीच में अटका हुआ है, सरकार को उनके लिए लड़ना चाहिए। जो इंजीनियर अमेरिका नहीं जा सकते, वे कहीं और जा सकते हैं। उन्हें रोकने के लिए भारत को वह देना होगा, जिसके लिए वे विदेश जा रहे थे। यानी शोध के लिए ठीक-ठाक पैसा, ऐसे विश्वविद्यालय, जो अच्छे शिक्षकों को रोक सकें, दस साल इंतजार करने को तैयार निवेशक, ऐसी अदालतें जो जल्दी व्यावसायिक विवाद निपटा दें, और ऐसे शहर, जहां सांस ली जा सके। इसलिए अमेरिका के आगे गिड़गिड़ाने से बेहतर यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे आईआईटी स्नातक अमेरिका में जो बना रहे थे, वही अगली पीढ़ी यहां बनाए। -लेखक तकनीकी एवं सामाजिक उद्यमी, सार्वजनिक नीति टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 12, 2026, 09:20 IST
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