चिंताजनक: अंटार्कटिका में अब तक का तेज ग्लेशियर पतन, 60 दिनों में आठ किमी पीछे हटा; आधी बर्फ ढही-बढ़ रहा खतरा

अंटार्कटिका के ईस्टर्न पेनिन्सुला में स्थित हेक्टोरिया ग्लेशियर ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। वर्ष 2023 में मात्र दो महीनों के भीतर यह ग्लेशियर करीब 8 किलोमीटर पीछे हट गया और इसकी लगभग आधी बर्फ टूटकर समुद्र में समा गई। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के नेतृत्व में हुए और जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इस अभूतपूर्व पतन के पीछे समुद्र के नीचे मौजूद समतल बेडरॉक की भूमिका निर्णायक रही, जिसने बर्फ को अचानक तैरने और नीचे से दरकने की स्थिति पैदा कर दी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इसी तरह की परिस्थितियां बड़े ग्लेशियरों के नीचे पाई गईं तो वैश्विक समुद्र स्तर में अपेक्षा से कहीं तज वृद्धि हो सकती है। आधुनिक समय में दर्ज सबसे तेज ग्लेशियर रिट्रीट की घटनाओं में शामिल इस मामले में हेक्टोरिया ग्लेशियर ने केवल 60 दिनों में लगभग 8 किलोमीटर बर्फ खो दी। अंटार्कटिका के मानकों के अनुसार यह ग्लेशियर अपेक्षाकृत छोटा है और इसका क्षेत्रफल लगभग 115 वर्ग मील है, जो अमेरिकी शहर फिलाडेल्फिया के आकार के बराबर है। फिर भी वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इससे कहीं बड़े ग्लेशियरों में इसी तरह की प्रक्रिया सक्रिय हुई तो इसके वैश्विक समुद्र स्तर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। इस शोध का नेतृत्व यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर की शोधकर्ता नाओमी ओचवाट ने किया, जो कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायरमेंटल साइंसेज (सीआईआरईएस) की पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्चर हैं। भूवैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि 15,000 से 19,000 वर्ष पहले भी ऐसे समतल क्षेत्रों पर स्थित ग्लेशियर असाधारण गति से पीछे हटे थे, कभी-कभी सैकड़ों मीटर प्रतिदिन। जब टाइडवॉटर ग्लेशियर पतला होता है, तो वह समुद्र तल से उठकर पानी की सतह पर तैरने लगता है। दुर्लभ कैल्विंग प्रक्रिया और श्रृंखलाबद्ध टूटन समतल बेडरॉक के कारण ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा लगभग एक साथ जमीन से उठ सका। एक बार तैरने के बाद बर्फ सीधे समुद्री ताकतों के संपर्क में आ गई। ग्लेशियर के आधार पर दरारें खुलीं और ये दरारें सतह की दरारों से जुड़ गईं। इस श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया ने कुछ ही हफ्तों में व्यापक कैल्विंग की प्रक्रिया को जन्म दिया, जिससे ग्लेशियर का लगभग आधा हिस्सा टूट गया। लगातार सैटेलाइट अवलोकनों ने इस पूरी घटना के क्रम को विस्तार से समझने में मदद की। ओचवाट के अनुसार, यदि केवल हर तीन महीने में एक तस्वीर मिलती, तो यह पता नहीं चल पाता कि ग्लेशियर ने केवल दो दिनों में ढाई किलोमीटर तक बर्फ खो दी थी। भूकंपीय संकेतों से पुष्टि शोधकर्ताओं ने इस अवधि के दौरान ग्लेशियर भूकंपों को दर्ज करने के लिए सिस्मिक उपकरण भी तैनात किए। इन उपकरणों ने तेज रिट्रीट के दौरान कई झटकों को रिकॉर्ड किया। इन भूकंपीय संकेतों ने पुष्टि की कि ग्लेशियर पहले ठोस रूप से बेडरॉक पर टिका हुआ था और बाद में उठकर तैरने लगा। अन्य वीडियो:-

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 28, 2026, 03:57 IST
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