तकनीक: ताकि दु:स्वप्न न बने एआई, आशंकित खतरों पर हो खुलकर बात
इन दिनों देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारी अभियानों से लेकर स्टार्टअप खड़ा करने तक, स्वास्थ्य सेवा से लेकर खेती तक, एआई को वह ताकत माना जा रहा है, जो भारत को भविष्य की ओर ले जाएगा। हाल ही में, इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में इसकी गति को दर्शाया गया, जिसमें नीति निर्माताओं, आंत्रप्रेन्योर्स और स्वयंसेवी संगठनों ने जोखिम और फायदों पर बहस की। मगर इस उत्साह के बीच, एक गंभीर सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और वह यह कि लाखों भारतीय इस प्रौद्योगिकी से अनजान हैं, जबकि इसका पहले से ही फायदा उठाया जा रहा है। प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर पाना और उसके बारे में जागरूक होना एक जैसा नहीं है। इस साल की शुरुआत में, बंगलूरू में एक 22 साल का सॉफ्टवेयर इंजीनियर धोखाधड़ी का शिकार हो गया। उसने एक डेटिंग एप पर साइन अप किया और इशानी नाम की प्रोफाइल से दोस्ती की। उसे यह नहीं पता था कि इशानी एक एआई निर्मित डीपफेक तरीका था। बातचीत जब व्हाट्सएप पर होने लगी, तो धोखेबाज ने उसे वीडियो कॉल के दौरान कपड़े उतारने के लिए कहा। और उस वीडियो कॉल को चुपके से रिकॉर्ड करके पीड़ित को कई अकाउंट में 1.5 लाख रुपये भेजने के लिए ब्लैकमेल किया। पुलिस का मानना है कि धोखा करने वालों ने नकली महिला को असली दिखाने के लिए एआई से बने वीडियो का इस्तेमाल किया। पीड़ित को लगा कि वह किसी जिंदा इन्सान से बात कर रहा है। यह आकलन उसे बहुत महंगा पड़ा। यह अकेली घटना नहीं है। डेटिंग एप्स पैसों से लेकर यौन शोषण तक की धोखाधड़ी के लिए मुफीद बन गए हैं। एआई अब इन चीजों को और बढ़ा रहा है, जिससे नकली पहचान ज्यादा प्रभावी हो गई है। बंगलूरू का मामला याद दिलाता है कि जैसे-जैसे एआई टूल्स आसानी से मिल रहे हैं, वैसे-वैसे इससे होने वाले अपराध भी बढ़ रहे हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि कई लोग वीडियो कॉल पर मौजूद व्यक्ति को असली मान लेते हैं, जिससे अक्सर ऐसे अपराध होते हैं। डेटिंग एप्स से जुड़े यौन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं, इसलिए उपयोगकर्ताओं से सावधान रहने की अपील की जाती है। यह कमजोरी एक और परेशान करने वाली बात से जुड़ी है। प्यू रिसर्च सेंटर के 25 देशों में किए गए एक वैश्विक सर्वे से पता चला है कि एआई के बारे में जागरूकता के मामले में भारतीय सबसे निचले पायदान पर हैं। सिर्फ 14 प्रतिशत वयस्क भारतीयों ने कहा कि उन्होंने एआई के बारे में कुछ सुना या पढ़ा है, जबकि दूसरे 32 प्रतिशत ने थोड़ा सुना है। कुल मिलाकर, यह 46 फीसदी जागरूकता का स्तर सर्वे किए गए सभी देशों में सबसे कम है। 18-34 साल के युवाओं में, जागरूकता सिर्फ 19 फीसदी थी, केन्या के बाद दूसरी सबसे कम। इसके उलट, जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में 90 फीसदी से ज्यादा लोग इसके बारे में जानते थे। हैरानी की बात है कि कम जागरूकता के बावजूद, लगभग 89 फीसदी भारतीयों ने अपनी सरकार की एआई को विनियमित करने की क्षमता पर सबसे ज्यादा भरोसा दिखाया। यह बिना जानकारी के भरोसे वाली बात बताती है कि नागरिक विनियमन को सरकार का काम मानते हैं, अपना नहीं। पर बिना समझ के भरोसा लोगों को छेड़छाड़ और दुरुपयोग का शिकार बना देता है। भारत में तेजी से डिजिटल बदलाव हो रहा है। शहरी पेशेवर शायद बिना जाने रोज एआई संचालित उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों के लोगों को ज्यादातर पता नहीं होता कि यह तकनीक कैसे काम करती है। यह अंतर इसलिए मायने रखता है, क्योंकि धोखा खाने का मतलब सिर्फ लोगों के साथ धोखाधड़ी होना नहीं है। यह देश के एआई लक्ष्यों को कमजोर करता है। जब नागरिक एआई को पूरी तरह से समझते नहीं हैं, तो वे गोपनीयता, पूर्वाग्रह या नैतिकता के बारे में सही बहस में शामिल नहीं हो पाते। वे न तो विनियामक को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और न ही खुद को धोखे से बचा सकते हैं। ऐसे में, वे छोटे व्यवसाय, शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा के लिए एआई का पूरा फायदा नहीं उठा सकते। इसलिए बंगलूरू की घटना सिर्फ एक अपराध कथा नहीं है। यह एक बड़ी राष्ट्रीय कमजोरी है : कम एआई साक्षरता और अधिक भरोसा, जो खतरनाक संयोजन है। यदि भारत एआई का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना चाहता है, तो उसे जागरूकता बढ़ानी होगी। स्कूलों और कॉलेजों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप के तहत एआई और डिजिटल साक्षरता मॉड्यूल शामिल करने चाहिए। माई जीओवी, डिजिटल इंडिया और दूरदर्शन जैसे मंचों के जरिये जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, जिनमें एआई को सरल शब्दों में समझाया जा सके। नागरिकों को पता होना चाहिए कि डीपफेक कैसे काम करते हैं, स्कैम कैसे काम करते हैं, और खुद को कैसे सुरक्षित रखें। कौशल विकास कार्यक्रम में एआई और डाटा एनालिटिक्स प्रशिक्षण को शामिल करना चाहिए, ताकि ग्रामीण युवा पीछे न रहें। डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे कानूनों का पारदर्शी अमल और नागरिकों को भी जानकारी होनी चाहिए। स्थानीय कार्यशाला, स्वयंसेवी संगठन और सिविल सोसाइटी समूह लोगों को धोखाधड़ी को पहचानना और टेक्नोलॉजी का सुरक्षित इस्तेमाल करना सिखाने में भूमिका निभा सकते हैं। लोगों को आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। एआई को लेकर भारत की इच्छाएं वास्तविक हैं, लेकिन बिना जानकारी के इच्छाएं कमजोर होती हैं। बंगलूरू की घटना दर्शाती है कि भरोसे का कितनी जल्दी फायदा उठाया जा सकता है। लेकिन लाखों लोगों को वास्तव में इसके बारे में बहुत कम पता है। एआई सिर्फ एल्गोरिदम और नवाचार के बारे में नहीं है। यह लोगों के बारे में है। अगर लाखों लोग गैर-जागरूक बने रहे, तो भारत की एआई क्रांति धोखाधड़ी और शोषण की वजह से पटरी से उतर सकती है। इसलिए, एआई के बारे में चर्चा के साथ-साथ पढ़ाई-लिखाई, नैतिकता और सावधानी के लिए भी गंभीर प्रतिबद्धता होनी चाहिए। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान भविष्य का आह्वान करने वाले एक देश का उत्साह दिखा। लेकिन जब हम जोखिमों और फायदों पर बहस करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि तकनीक उतनी ही मजबूत है, जितने मजबूत लोग इसे इस्तेमाल करते हैं। बंगलूरू जैसे मामले यह साबित करते हैं कि नासमझी महंगी पड़ सकती है। भारत की एआई कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर देखने के बजाय यथार्थवादी दृष्टि से देखने की जरूरत है। इसके लिए ऐसे नागरिकों की जरूरत है, जो जानकार, सावधान और मजबूत हों। इसके बिना, एआई दुःस्वप्न बन सकता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 24, 2026, 05:37 IST
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