बंगाल: एसआईआर के आंकड़ों से इस बार टीएमसी को खेला होने का डर, भाजपा की चौतरफा घेराबंदी से बढ़ी ममता की चुनौती
पश्चिम बंगाल में बीते चुनाव में भाजपा के खिलाफ खेला होबे का नारा देकर मैदान मारने वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को इस बार अपने साथ खेला होने का डर सता रहा है। कारण, एसआईआर के बाद तैयार नई मतदाता सूची है, जिसने पार्टी के मजबूत मुस्लिम वोट बैंक पर सीधा और करारा प्रहार किया है। एक तरफ नई सूची ने सीमावर्ती और मुस्लिम बहुल सीटों के सियासी समीकरण बदल दिए हैं, तो दूसरी ओर प्रशासनिक अमले पर चुनाव आयोग के जमीनी स्तर पर कसे शिकंजे व अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व उपस्थिति ने मुकाबले को बेहद रोचक बना दिया है। दरअसल, शुरुआत में एसआईआर मामले में संसद से सड़क व सुप्रीम कोर्ट तक अपने आक्रामक अभियानों से बढ़त लेती दिख रही तृणमूल इस मोर्चे पर अब पीछे छूट गई है। न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना के बाद राज्य सरकार को सीधे सुप्रीम कोर्ट का कोपभाजन बनना पड़ा। इसके बाद आई मतदाता सूची से करीब 91 लाख मतदाताओं का नाम कटने से सीएम ममता की इस मुद्दे पर पूरी रणनीति ही धराशाई हो गई। ये भी पढ़ें:-केरलम में अनुभव बनाम बदलाव की जंग: राजग को चमत्कार की उम्मीद, सत्ता विरोधी लहर के बीच विकास भी प्रभावी मुद्दा तृणमूल के लिए चिंता क्यों नई मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में नाकाम रहने वाले अधिकतर मुस्लिम हैं जो तृणमूल के कट्टर समर्थक रहे हैं। मसलन, एक ओर जहां हर विधानसभा में औसतन 31 हजार वोट कम हुए हैं, वहीं मुस्लिम बहुल या प्रभाव वाली सीटों पर यह संख्या औसतन 45 से 50 हजार का है। मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नादिया, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले जहां तृणमूल की तूती बोलती रही है, ऐसे छह जिलों में ही करीब 50 लाख वोट कम हुए हैं। एसआईआर का 157 सीटों पर सीधा असर बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा-तृणमूल के बीच मतों का अंतर 7 से 8 फीसदी के बीच रहा है। नई मतदाता सूची में सामान्य विधानसभा सीटों पर औसतन 31 हजार तो मुस्लिम बहुल सीटों पर औसतन 45 हजार मतदाता घटे हैं। बीते चुनाव में ऐसी 57 सीटें थीं जहां नजदीकी मुकाबले में हार-जीत का अंतर महज 600 से 8,000 था। ऐसे में करीब 100 मुस्लिम बहुल व 57 नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर एसआईआर का सीधा असर पड़ेगा। ये भी पढ़ें:-Social Media: सोशल मीडिया पर अपशब्दों के इस्तेमाल के खिलाफ कानून लाएगी ओडिशा सरकार, कानून मंत्री ने दी जानकारी प्रशासन पर भी कड़ा पहरा निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए इस बार चुनाव आयोग ने स्थानीय प्रशासन पर कड़ा शिंकजा कसा है। मुख्य सचिव, पुलिस उपायुक्त को हटाने की शुरुआती पहल के बाद डीआईजी रैंक के पांच अधिकरियों, 13 जिलों के एसपी-डीएम के साथ ही 200 से अधिक थानों के प्रभारियों को भी बदल दिया गया है। इसके अलावा आयोग ने पहली बार राज्य में अर्धसैनिक बलों की 2,000 कंपनियां (2.40 लाख जवान) तैनात करने का फैसला किया है। इनमें से 500 कंपनियां तैनात भी कर दी गई हैं। इसके कारण पहली बार राज्य में चुनाव पूर्व हिंसा पर रोक लगी है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 09, 2026, 02:53 IST
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