Bihar: 300 साल पुराने स्टोन आर्ट मिला GI टैग, पत्थरकट्टी की मूर्तियों की विदेशों में भी डिमांड; पढ़ें पूरी खबर
बिहार के गया जिले के नीमचक बथानी प्रखंड के पत्थरकट्टी गांव जहां मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध है। यहां पत्थरों को तराशकर खूबसूरत मूर्तियां बनाने की कला के लिए जाना जाता है। भगवान बुद्ध और महावीर की मूर्तियों के अलावे अलग अलग कलाकृतियों की मूर्तियां बनाई जाती हैं। अब इस कला को विशेष पहचान मिल गई है। इसे जीआई टैग मिला है।पत्थरकट्टी गांव में स्टोन आर्ट्स से जुड़े करीब 650 से अधिकलोगहैं। जीआई टैग मिलने से इन कलाकारों और मूर्ति की पहचान विदेशों में भी होगी। इससे इनकी आमदनी भी बढ़ेगी। जीआई टैग मिलने से शिल्पकारों में खुशी की लहर है। अब मूर्तियों की अच्छी ब्रांडिंग के साथ वैश्विक बाजारों में इन उत्पादों की पहुंच आसान होगी। पत्थरकट्टी की मूर्तियों का जीआई टैग मिल गया 2022 से पत्थरकट्टी गांव के शिल्पकार जीआई टैग मिलने के लिए संघर्ष कर रहे थे। 2025 में झारखंड के रांची में दस न्यायधीशों ने जीआई टैग पर मुहर लगा दी है। शिल्पकार रविन्द्र नाथ गौड़ ने बताया कि पिछले 2022 में सरकार से आग्रह करते रहे, ताकि जल्द जीआई टैग मिल जाएं। हालांकि 29 जनवरी 2025 में झारखंड के रांची जिले में दस सदस्यीय न्यायधीशों के समक्ष पत्थरकट्टी की मूर्तियां प्रस्तुत की गई थी। इसके बाद पत्थरकट्टी की मूर्तियों कोजीआई टैग दिया गया। अब सिर्फ नाबार्ड द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित कर सभी शिल्पकारों को सर्टिफिकेट मिल जाएगा। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस गांव का नामरखा था यहां की पत्थर से बनी मूर्तियों को बिहार सहित अन्य राज्यों के अलावे विदेशी पर्यटक ले जाते हैं। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस गांव का नाम पत्थरकट्टी रखा था। यहीं पर शिल्पकारों ने काले ग्रेनाइट पत्थर की पहाड़ी को खोजा। इसके बाद सभी शिल्पकारों को यहां बसाने का काम किया था। पत्थरकट्टी के काले ग्रेनाइट पत्थर से विष्णुपद मंदिर का निर्माण करवाया गया। उस वक्त तीन सौ कारीगर राजस्थान से गया आएं थे। पत्थरकट्टी गांव में मौजूद काला पहाड़ के पत्थर को तराश कर विष्णुपद मंदिर का निर्माण किया गया था। मंदिर निर्माण के बाद अधिकांश लोग चले गए। लेकिन, राजस्थान से आए तीन परिवार गांव में ही रह गए। इनके ही वंशज अब मूर्तियों को तराश कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। जानिए क्या होता जीआई टैग जीआईटैगका मतलब होता है जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी भौगोलिक संकेतक। इसका इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है। किसी प्रोडक्ट को ये खास भौगोलिक पहचान मिल जाने से उस प्रोडक्ट के उत्पादकों को उसकी अच्छी कीमत मिलती है। इसका फायदा ये भी है कि अन्य उत्पादक उस नाम का इस्तेमाल कर अपने सामान की मार्केटिंग भी नहीं कर सकते हैं।पूरी खबर पढ़ें
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 19, 2025, 09:42 IST
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