Bilaspur-Raipur Four/Six Lane Project: 14 साल बाद किसानों को SC से मिली उम्मीद, NHAI को मिला और वक्त
वर्ष 2012 से बिलासपुर-रायपुर फोर लेन और सिक्स लेन प्रोजेक्ट के कारण अपनी कीमती जमीन गंवाने वाले किसानों को 14 साल के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अब न्याय की उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस सतीश शर्मा की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि मुआवजा वितरण में कुछ विसंगतियां हैं और उनमें सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से भी इस संबंध में बात करने और अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलील को स्वीकार करते हुए समय प्रदान किया। लंबित मामलों पर याचिकाकर्ताओं की दलीलें याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और सुदीप श्रीवास्तव ने न्यायालय को अवगत कराया कि यह मामला पिछले 12 वर्षों से लंबित है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नए मार्गदर्शिका सिद्धांत केवल नए मामलों पर लागू होंगे, पुराने मामलों पर नहीं। अन्य याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने भी मामले के शीघ्र समाधान पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने एनएचएआई और छत्तीसगढ़ सरकार के अधिवक्ताओं के कथनों पर विचार करने के लिए समय देने का निर्णय लिया। 12 साल से चल रहा कानूनी संघर्ष यह मामला 2012 से लगातार न्यायालय में विचाराधीन है। इस दौरान दो बार मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर), दो बार जिला जज और एक बार उच्च न्यायालय में सुनवाई हो चुकी है। इसी मामले से जुड़े एक अन्य प्रकरण में उच्च न्यायालय की दो खंडपीठों ने यह व्यवस्था दी थी कि अधिक जमीन वाले किसानों को कम मुआवजा देना अनुचित है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि जिन दरों पर छोटी जमीन वाले किसानों को मुआवजा दिया गया है, उन्हीं दरों के आधार पर बड़ी जमीन वाले किसानों को भी मुआवजा मिलना चाहिए, यदि उनकी जमीनें भी सड़क किनारे समान रूप से स्थित हों। एनएचएआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं, याचिकाकर्ताओं ने दो बार मध्यस्थता और दो बार जिला न्यायालय में सुनवाई के बाद उन्हें पुनः मध्यस्थता के लिए भेजे जाने के खिलाफ याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुआवजा निर्धारण के लिए केवल दो दरें उपलब्ध हैं, जिनमें से एक को मध्यस्थ, जिला न्यायालय और उच्च न्यायालय पहले ही नकार चुके हैं। ऐसे में, दूसरे उपलब्ध विकल्प के आधार पर ही मुआवजा तय होना चाहिए और किसी नए मुकदमे की आवश्यकता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को अंतिम रूप से करने का आदेश दिया है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 17, 2026, 17:17 IST
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