बिमल सहगल की कविता- कहां, किधर, कब और कैसे

कहां, किधर, कब और कैसे- इन सभी सवालों से कहीं कठिन तो क्यों ही रहा है क्योंकि इसका अक्सरकभी कोई सहज जवाब नहीं मिला; और आवश्यक भी तो नहीं कि हर सवाल का कोई वाजिब जवाब हो भी। बेशक, इसे जितनी भी आसानी से उठाया जाए- कभी भी, कैसे भी, कहीं भी मगर सभी क्यों का कोई बेबाक जवाब तो खुद ही हमेशा से, हर किसी को भ्रमित शुतुरमुर्ग की जात की तरह जमीन में ही सिर गाढ़े, आँखें मिचे, अपने ही इत्मीनान में खोया, बाहरी दुनिया के झमेलों से लगातार बचता अनजान बना बैठा ही मिला है। स्वाभाविक प्रवृति की बुक्कल डाले हर क्यों का कोई मान्य जवाब तो संभवतः बाद में भी यूं ऐसे स्तब्ध बैठा ही मिलेगा जब तक कि अंतर्दर्शन के लिए मजबूरी में उठ कर चलने किसी का, कहीं से इसे कोई अपरिहार्य आदेश न आन मिले। हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 26, 2026, 20:45 IST
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