शेखी बघारना और बात है: जीवन की गुणवत्ता के मामले में पोलैंड, लिथुआनिया और साइप्रस से भी पीछे है अमेरिका

अमेरिकी शेखी बघारना पसंद करते हैं कि हम दुनिया में सबसे अव्वल हैं। निश्चित रूप से वे दूसरे देशों पर हमला करने और विदेशी नेताओं को अगवा करने की अपनी सैन्य क्षमता में अव्वल हैं। लेकिन आम नागरिकों की भलाई के मामले में हाल ही में जारी सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स नामक अध्ययन बताता है कि जीवन की गुणवत्ता के मामले में, अमेरिका 171 देशों में 32वें स्थान पर है और पोलैंड, लिथुआनिया और साइप्रस जैसे देशों से पीछे है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में, रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों राष्ट्रपतियों के समय में रैंकिंग में अमेरिका लगातार नीचे गिरता गया और अब ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा स्वास्थ्य देखभाल और दूसरी सेवाओं में कटौती के कारण यह और नीचे गिरेगा। सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स 2010 में विद्वानों और विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय टीम ने पेश किया था। 2011 में अमेरिका 18वें नंबर पर था। चिंताजनक होने के बावजूद तब भी फ्रांस, इटली और स्पेन से अमेरिका आगे था। लेकिन अब वे देश अमेरिका से आगे निकल गए हैं। इस सूचकांक को प्रकाशित करने वाले समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल ग्रीन ने कहा कि सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में 12 घटक हैं, और 2011 से अमेरिका इन सभी की रैंकिंग में नीचे गिरा है। उन्होंने आगे यह भी बताया कि अमेरिका में जीवन की गुणवत्ता सिर्फ कुछ छोटे स्कैंडिनेवियाई देशों से ही नहीं, बल्कि अमेरिका के सभी जी-7 प्रतिस्पर्धियों से भी खराब है। अमेरिका स्लोवेनिया, लिथुआनिया और एस्टोनिया जैसे पुराने कम्युनिस्ट देशों और दक्षिण कोरिया जैसे दूसरे नए लोकतंत्रों से भी पीछे रह गया है। वह कहते हैं कि अमेरिका ने एक आर्थिक महाशक्ति और सामाजिक प्रगति की महाशक्ति बनकर शीतयुद्ध जीता था। लेकिन पिछले 30 वर्षों में, अमेरिका ने सामाजिक प्रगति के मामले में सब यों ही चलने दिया है। सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स बेशक सिर्फ एक पैमाना है, और कोई इस या उस स्कोर पर बहस कर सकता है। लेकिन विभिन्न देशों में जीवन की गुणवत्ता को मापने के लिए यह वस्तुनिष्ठ आंकड़ों के इस्तेमाल करने का एक उपयोगी तरीका है। इस सूचकांक के अनुसार, सुरक्षा के लिहाज से अमेरिका 99वें स्थान पर है, यानी वह पाकिस्तान और निकारागुआ से भी पीछे है। स्कूली शिक्षा (बारहवीं तक) के मामले में अमेरिका 47वें स्थान पर आता है, जहां वह वियतनाम और कजाकिस्तान से नीचे है। वहीं, स्वास्थ्य के क्षेत्र में अमेरिका 45वें स्थान पर है और इस मामले में भी वह अर्जेंटीना और पनामा से पीछे ही है। खुशहाली के आधार पर देशों का आकलन करने की ज्यादातर दूसरी कोशिशें भी दिखाती हैं कि हाल के वर्षों में अमेरिका संघर्ष कर रहा है। हालिया वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट, जो खुशी और लोग अपनी जिंदगी का मूल्यांकन कैसे करते हैं, इस बारे में मतदान के आधार पर देशों की रैंकिंग तय करती है, उसमें अमेरिका 24वें स्थान पर है, जो एक दशक पहले के 15वें स्थान से नीचे है। अटलांटिक काउंसिल के फ्रीडम इंडेक्स में अमेरिका 22वें नंबर पर गिरावट की तरफ है, और इकनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के डेमोक्रेसी इंडेक्स में अमेरिका 28वें नंबर पर है। इस साल अमेरिकी आजादी के घोषणापत्र की 250वीं सालगिरह है, जिसमें जीवन, आजादी और खुशी की तलाश का जश्न मनाया जाता है। एक तरह से, सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स और ये दूसरे आकलन उपकरण मूल्यांकन करते हैं कि अमेरिका अपने ही पैमानों के हिसाब से दुनिया में किस स्थान पर है। निश्चित रूप से आर्थिक विकास के मामले में अमेरिका ने बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन वह उस जीडीपी विकास को उन चीजों में बदलने में पीछे रह जाता है, जिनकी आम लोगों को सबसे अधिक परवाह है। इसके उलट, लातविया को लें। इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी अमेरिका की आधी से भी कम है, लेकिन सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में इसके अंक अमेरिका जैसे ही हैं। लगता है कि आंकड़े इकट्ठा करने के मामले में (जैसे नवजात बच्चों की मृत्यु दर) अमेरिका कुछ दूसरे देशों से ज्यादा ईमानदार है, और चिंता की बात है कि पश्चिमी यूरोप, अपनी सामाजिक तरक्की के बावजूद, एक ऐसा आर्थिक मॉडल अपना रहा है, जो नवाचार और दीर्घकालीन विकास को दबाता है। फिर भी, यह सूचकांक कुछ हकीकत भी दर्शाता है। यह उस निराशा और असंतोष को समझाता है, जिसने दक्षिणपंथी डोनाल्ड ट्रंप और वामपंथी जोहरान ममदानी की चुनाव जीतने में मदद की। जब अमेरिकी कहते हैं कि व्यवस्था उनके लिए काम नहीं कर रही है, तो ये रैंकिंग ही बताती हैं कि उन्हें ऐसी निराशा क्यों महसूस होती है। जैसा कि मैंने कहा था, हालात और खराब हो सकते हैं। ट्रंप के स्वास्थ्य देखभाल में कटौती के फैसले से सालाना 51,000 लोगों की जान जा सकती है और हर साल 1,01,000 नशे की लत के मामलों तथा 1,38,000 मधुमेह के मामलों का भी इलाज नहीं हो पाएगा। उदारवादी लोग शायद ट्रंप की कमियों पर ध्यान दिलाना चाहें। लेकिन यहां कुछ और भी बड़ा हो रहा है: लगभग 1970 से, अमेरिका जीवन की गुणवत्ता के पैमानों पर दूसरे देशों से पीछे चल रहा है। ग्रीन कहते हैं कि इसके जिम्मेदार सिर्फ ट्रंप नहीं हैं। ओबामा और बाइडन ने भी इस गिरावट को रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया, और न ही बुश या क्लिंटन ने। यह कई राष्ट्रपतियों की निष्क्रियता से हुआ धीमा पतन है। फिर भी, ऐसा लगता है कि बढ़ते शेयर बाजार और आर्थिक विकास से मतदाता सुन्न हो गए थे, जब तक कि हाल के वर्षों में लोगों को यह स्पष्ट नहीं हो गया कि उनके जीवन का स्तर ठहर गया है और इसीलिए उन्होंने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन और ट्रंप के लोकलुभावन वादे का रुख किया। तो इसका समाधान क्या है इसका एक हिस्सा मानव पूंजी में निवेश हो सकता है-बच्चों, शिक्षा और कौशल स्तर के उन्नयन में। इसमें बचपन की शुरुआती पहलों से लेकर व्यावसायिक प्रशिक्षण तक, ड्रग उपचार से लेकर सामुदायिक कॉलेजों तक, सब कुछ शामिल हो। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की लगातार गिरती साख अमेरिकियों के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए। अमेरिका वैसा देश नहीं है, जैसा वह खुद को समझता है। उसे इस आत्मसंतुष्टि को छोड़ देना चाहिए। हालांकि, वह इस बात पर खुश हो सकता है कि देशभक्ति के मामले में वह 32वें स्थान पर है।- ©The New York Times 2026

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 22, 2026, 05:57 IST
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