बुढ़वा मंगल 2025: अस्सी से राजघाट तक 15 बजड़ों पर सजेगी संगीत की महफिल, गंगा की लहरों पर कल मनाया जाएगा जश्न

फूलों की लड़ियों से सजी नाव-बजड़े, चांदनी-मसनद, शमादान और गलीचे पर सजी संगीत की महफिल। गुलाब की भीनी-भीनी खुशबू। लाल-पीले गुलाल से रंगे चेहरे। जी ऐसा नजारा होली के बाद काशी के बुढ़वा मंगल का होता है। होली के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को यानी 18 मार्च को बुढ़वा मंगल का ये उत्सव मनाया जाएगा। अस्सी से राजघाट तक बजड़ों पर बुढ़वा मंगल की महफिल सजेगी। काशी में गीत, गुलाल, और खुशियों के साथ बुढ़वा मंगल का अनोखा जश्न मनाया जाता है। ये काशी की संस्कृति और परंपरा का ही प्रतीक है। जब लोग अपने घरों से निकलकर बनारस के गंगा घाट पहुंचते हैं और बजड़े पर सजी संगीत की महफिल में रंग, अबीर-गुलाल के साथ खुशियों का जश्न मनाते हैं। पक्का महाल के 78 वर्षीय बच्चेलाल ने बताया कि होली के बाद काशी के लोगों में एक अनोखी खुमारी छाई रहती है, जो बुढ़वा मंगल के साथ समाप्त होती है। यह परंपरा कई साल पुरानी है और बनारस आज भी इसे संजोए हुए है। इस त्योहार को लोग होली के समापन के रूप में भी मनाते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 17, 2025, 17:12 IST
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