Social Media Poetry: औरत है वो ये मत पूछो कैसे-कब-क्या कर सकती है
औरत है वो ये मत पूछो कैसे-कब-क्या कर सकती है। दो फूलों से खुश हो सकती, दो लफ़्ज़ों से मर सकती है। ज़ख़्मों जैसा देखोगे तो वो छूरी भी है खंजर भी, उसको मरहम कर लोगे तो वो सारा ग़म हर सकती है। अपनों पर आ जाएगी तो लड़ जाएगी यमदूतों से, वैसे तो घर के अंदर वो चूजे से भी डर सकती है। अपने मन की सारी बातें कह देने को आतुर है पर, अपने आंचल के अंदर वो सारा अंबर भर सकती है। क्या है कब है क्यों है कैसे जैसे कई सवालों वाली, बैठे-बैठे चुप रहकर भी सबको पागल कर सकती है। वो फूलों पर उड़ने वाली तितली जैसी नाजुक है पर, छू दोगे तो मधुमक्खी के काटों में भी ढल सकती है। मखमल के ऊपर चलने में कर देगी वो ऊंहूं लेकिन अपनों पर आ जायेगी तो अंगारों पर चल सकती है। मां जो बिस्तर पर लेटी है कोई उसको लेकर आना, उसके केवल छू देने से सारी बाधा टल सकती है। जगदंबा बनकर आई तो ममता अपनी बरसाएगी, काली बनकर आएगी तो सारी दुनिया जल सकती है। जंगल उपवन हो जाएगा इसके केवल हंस देने से, उसके आंसू आ जाने से सारी श्रृष्टि उबल सकती है। कारण के अनुसंधानों में मन संयम खोने वालों, ये मत भूलो औरत है वो बिन कारण भी लड़ सकती है। तारीफों से पुल बन जाए उसके दिल तक नामुमकिन है, चालाकी पकड़ी जाए तो मुंह पर थप्पड़ जड़ सकती है। उसके आगे बैठे हो तो सब पत्तों पर ये लिख लेना, वो शर्माकर हंस देगी तो बाजी उल्टी पड़ सकती है। दे दे कर वह अग्नि परीक्षा भी शापित ही रह जाए तो, कुल की मर्यादाओं के हित धरती में भी गड़ सकती है। वह चिड़िया जो उस डाली से उड़कर इसपर आई होगी, असमंजस में मत रहना तुम वह इससे भी उड़ सकती है। साभार: चित्रगुप्त की फेसबुक वाल से हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 21, 2026, 17:21 IST
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