जलवायु परिवर्तन: बदली मौसम की परिभाषा, क्या इसे अंत की तैयारी समझें

अब इसमें कोई भी उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है कि गर्मी हमें धीरे-धीरे घेर रही है। यह कैसी वाली नई गर्मी है, इसे समझ लेना चाहिए। एक समय था, लगभग तीन-चार दशक पहले, जब जून का मतलब वास्तव में जून होता था। उमस वाला नहीं, गर्मी का मौसम कहलाता था, और यह गर्मी कहीं-न-कहीं मानसून की परिस्थितियों को भी पैदा करती थी। लेकिन, आज गर्मी की परिभाषा बदल गई है। आज आप देखिए कि औसतन तापमान 34 से 35 डिग्री के आसपास रहता है, पर जिससे अधिक असहजता होती है, वह है उमस। आपने यह भी देखा होगा कि अब उमस जून में नहीं, बल्कि मई में ही आने लगी है, जबकि पहले यह अक्सर वर्षा के बाद जुलाई-अगस्त में आती थी। इसे इस रूप में समझने की आवश्यकता है कि जब पृथ्वी का तापक्रम बढ़ता है, तो इसे केवल भूमि ही नहीं, बल्कि समुद्र भी बड़े पैमाने पर झेलते हैं। और चूंकि, पृथ्वी पर समुद्रों का आयतन अधिक है, इसलिए प्रभाव भी व्यापक होता है। अब यदि समुद्र लगातार गर्म होते जाएंगे, तो स्वाभाविक है कि उनमें वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा। इसका पहला और बड़ा प्रभाव यह होगा कि कहीं भी, कभी भी वर्षा हो सकती है। दूसरा बड़ा प्रभाव यह पड़ेगा कि इन हालातों में मानसून पूरी तरह विचलित हो जाएगा। अब देखिए, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस या पश्चिमी विक्षोभ का निर्माण कैस्पियन सागर के क्षेत्र में होता है। वह वहां से चलता हुआ उत्तर-पश्चिमी भारत में प्रवेश करता है और फिर उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों तक फैल जाता है। इसका प्रभाव शीतकालीन समय में व्यापक रूप से दिखाई देता है। लेकिन, हाल के वर्षों में यह पश्चिमी विक्षोभ जिस समय सक्रिय होना चाहिए था, उस समय न होकर बाद में सक्रिय होता है। इसी वर्ष शीतकालीन वर्षा का बड़ा अभाव रहा है। इस कारण एक ओर जहां ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में पर्याप्त बर्फ जमनी थी, वह नहीं जम पाई। वहीं, दूसरी ओर, नमी की कमी के चलते आग ने वनों को लीला। पहाड़ों पर पानी की कमी का असर केवल स्थानीय लोगों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झेलना पड़ता है। पूरे देश में अपर्याप्त वर्षा के कारण अब तक कई राज्य और जिले सूखे की स्थिति में पहुंच चुके हैं। अगर पिछले 70 वर्षों का लेखा-जोखा देखें, तो मात्र 25 वर्ष अधिक वर्षा हुई, 28 साल सूखे की स्थिति रही और बाकी सामान्य। इस तरह की खराब परिस्थितियों को केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग 50 देश झेलते हैं। एक समय ऐसा था, जब मानसून, गर्मी और शीतकाल का एक संतुलित व्यवहार हुआ करता था। वह समय तब था, जब हम पारिस्थितिकी तंत्र के साथ अधिक छेड़छाड़ नहीं करते थे। हम उतना ही उपभोग करते थे, जितना आवश्यक था। पर, जब से हमने विलासिता को अपनाया, हम उसकी चपेट में इस हद तक आ गए कि कोई सीमा ही नहीं बची। अब देखिए, कितनी अजीब स्थिति है-होर्मुज जलमार्ग बंद होने की खबर आते ही पूरी दुनिया में शोर मच गया कि पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत हो जाएगी। लेकिन, यदि आपने पिछले तीन महीनों में सड़कों पर नजर डाली हो, तो क्या आपको कहीं यह दिखाई दिया कि देश में ईंधन की किल्लत है शायद नहीं! क्योंकि, हम विलासिता की ऐसी गिरफ्त में हैं कि कितनी भी कीमत चुकानी पड़े, हम तैयार हैं। पर, हम यह भूल गए कि प्रकृति की भी अपनी एक कीमत है, जिसे हम कभी चुका नहीं पाएंगे। और वह अपने तरीके से प्रतिक्रिया करेगी। वही आज हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून को जिस तीव्रता से पूरे देश को भिगो देना चाहिए था, वह दिखाई नहीं दे रही। कारण, अब सब कुछ भटकी हुई स्थिति में है। कितना बरसेगा, कहां बरसेगा, कब बरसेगा, सब कुछ अनिश्चित हो चुका है। आने वाली पीढ़ी को क्या मिलेगा, यह सवाल पीछे छूट गया। उससे पहले वर्तमान ही मारने को तैयार है, जहां एक ओर उमस हमारी जान लेने को उतारू है, तो दूसरी तरफ पीने से लेकर सिंचाई तक, पानी का संकट है। यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। फ्रांस जैसे देशों से भी यह खबर आई है कि यूरोप के कई हिस्सों में तापक्रम 40-42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है और वहां लोगों की मृत्यु तक दर्ज की गई है। इसमें फ्रांस, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन भी शामिल हैं। वहां तो इमरजेंसी जैसी स्थितियां लागू हो गईं। हीट डोम और हीट स्ट्रेस ने यूरोप को दुखी कर दिया है। इन देशों में 1970 की तुलना में दो महीने अधिक उमस वाली गर्मी झेलनी पड़ रही है। ऐसे में, भारत, जो एक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में आता है, में इसका प्रभाव और भी अलग तथा गंभीर रूप में सामने आएगा। यहां उमस सबसे बड़ा संकट बनेगी। उमस का अर्थ यह भी है कि वर्षा का स्वरूप और अधिक अनिश्चित होगा। जल, जो हमारी तमाम आवश्यकताओं का आधार है, उस पर भी अंकुश लगेगा। खेती-बाड़ी से लेकर तन मन, सब संकट में घिर जाएंगे। और यह सब उसी का परिणाम होगा, जो हमने प्रकृति के साथ किया है। एक बात जो समझने के लिए ज्यादा जरूरी है कि प्रकृति का कुछ नहीं बिगड़ना, सिवाय उसके तेवर के। जब हम उसकी सीमाएं बार-बार तोड़ेंगे, तो वह मनुष्य को कष्ट देने को ही समाधान मानेगी, क्योंकि यही वह प्रजाति है, जिसने सबसे अधिक नुकसान किया है। इस वर्ष फरवरी असामान्य रूप से गर्म हो गया, मार्च ठंडा रहा, अप्रैल में तापक्रम 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और जून उमस भरा बन गया। आने वाले समय में वर्षा का इंतजार तो है, पर यह कैसे और कहां पड़ेगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। इसीलिए, वर्षाजनित नदियों की प्रकृति इस हद तक बदल गई है कि अब यह भी निश्चित नहीं रहा कि वे नदी हैं या नाला। हां, शहरी कचरा ढोने का रास्ता जरूर मिल गया है। इन कारणों से पर्यावरण लगभग पूरी तरह असंतुलित हो चुका है। मनुष्य का व्यवहार देखिए। जब इस प्रजाति का पेट विलासिता से भी नहीं भरा, और अपने सहजीवों-वनस्पतियों और वन्यजीवों को समाप्त कर दिया, तो अब यह आपस में लड़ने पर उतर आई है। ईरान, अमेरिका, इस्राइल, यूक्रेन और रूस के युद्धों को देख लीजिए और उनके कारणों पर विचार कीजिए। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार है और उसका असीम संग्रहण का स्वभाव। चाहे वह प्रकृति से हो, देशों से हो या परिस्थितियों से, सब कुछ अपने पक्ष में खींच लेने की लालसा। वह यह भूल गया है कि आने वाले समय में सबसे अधिक नुकसान उसी का होगा। एक समय था, जब पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और समाज, तीनों साथ-साथ चलते थे। आज लगभग सभी बंधन टूट चुके हैं। और, बाकी बचे हुए को भी तोड़ने की शुरुआत हो चुकी है। और इसे अंत की तैयारी ही समझिए, जो हमने स्वयं अपने लिए शुरू कर दी है। - edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 27, 2026, 08:10 IST
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