थोड़ा तोल मोल के बोल: राजनीति में भाषा की गंदगी और सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के बिगड़े बोल...पढ़ें ये खास लेख

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोए, कबीर दास जी के आपा खोए का मतलब बिल्कुल स्पष्ट है मान और अहंकार का त्याग करके ऐसे शब्दों में अपनी बात रखें कि औरों के साथ-साथ स्वयं को भी खुशी मिले। नए दौर में बोल मीठे नहीं बिगड़ गए हैं। वचन कटु नहीं, अब अभद्र हो गए हैं। लोग बोलते समय आपा खो रहे हैं और उनके आपा का अर्थ कबीर के दोहे को मुंह चिढ़ा रहा है। ऐसा ही इन दिनों देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति में भी दिखाई-सुनाई दे रहा है। शब्दों के बाण जहरबुझे हैं जो राजनीति की शुचिता को विषाक्त कर रहे हैं। संसदीय लोकतंत्र में राजनीति ही सर्वोपरि है। अगर राजनीति में भाषा की गंदगी इसी तरह उछलती रही तो झक सफेद पोशाक वाले राजनेताओं पर लगने वाले दाग अच्छे नहीं लगेंगे। सत्तापक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ नेता शब्दों की मर्यादा को इसी तरह लांघते रहेंगे तो उनकी आने वाले पीढ़ी विरासत में ऐसा शब्दकोश पा जाएगी, जिससे संसदीय और असंसदीय भाषा का अंतर मिट जाएगा। कह सकते हैं कि बदलते समाज में कोई भाषा की शुचिता का पालन नहीं कर रहा तो राजनेताओं से ही अपेक्षा क्यों करें। राजनेताओं से इसलिए क्योंकि वे समाज का रोल मॉडल हैं, उनकी कही बात समाज में नफरत और घृणा घोल सकती है और उनके समझाने का असर बड़े विवादों को भी शांत कर देता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 31, 2025, 14:16 IST
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