धूमिल की कविता- जब मैं अपनें ही जैसे किसी आदमी से बात करता हूँ

जब मैं अपनें ही जैसे किसी आदमी से बात करता हूँ, साक्षर है पर समझदार नहीं है । समझ है लेकिन साहस नहीं है । वह अपने खिलाफ चलाने वाली साजिश का विरोध खुल कर नहीं कर पाता । और इस कमजोरी को मैं जानता हूँ । लेकिन इसलिये वह आम मामूली आदमी मेरा साधन नहीं है यह मेरे अनुभव का सहभागी है, बनता है । जब मैं उसे भूख और नफ़रत और प्यार और ज़िंदगी का मतलब समझाता हूँ-और मुझे कविता में आसानी होती है-जब मैं ठहरे हुए को हरकत में लाता हूँ -एक उदासी टूटती है,ठंडापन ख़त्म होता है और वह ज़िंदगी के ताप से भर जाता है । मेरे शब्द उसे ज़िंदगी के कई-स्तरों पर खुद को पुनरीक्षण का अवसर देते हैं, वह बीते हुये वर्षों को एक- एक कर खोलता है । वर्तमान को और पारदर्शी पाता है उसके आर-पार देखता है । और इस तरह अकेला आदमी भी अनेक कालों और अनेक संबंधों मे एक समूह में बदल जाता है । मेरी कविता इस तरह अकेले को सामूहिकता देती है और समूह को साहसिकता । इस तरह कविता में शब्दों के ज़रिये एक कवि अपने वर्ग के आदमी को समूह की साहसिकता से भरता है जब कि शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु को समूह से विच्छिन्न करता है । यह ध्यान रहे कि शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु पर । हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 20, 2026, 19:18 IST
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