एमपी: मालवा के खेतों में खिला पीला सोना , उज्जैन में 100 बीघा में ऑर्गेनिक सूरजमुखी की खेती का सफल प्रयोग
मालवा की उर्वर माटी, जो अब तक मुख्य रूप से सोयाबीन, गेहूं और चने की पारंपरिक खेती के लिए जानी जाती थी, अब बदलाव की एक नई इबारत लिख रही है। पंजाब और उत्तराखंड की पहचान माना जाने वाला पीला सोना यानी सूरजमुखी अब उज्जैन के खेतों में अपनी चमक बिखेर रहा है। जिले के लालपुर क्षेत्र में युवा किसान ऋषभ पंड्या और उनकी टीम ने करीब 100 बीघा जमीन पर ऑर्गेनिक सूरजमुखी की खेती का सफल प्रयोग किया है, जो मालवा के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। सोयाबीन की जगह क्यों बेहतर है सूरजमुखी मालवा का किसान लंबे समय से मानसून पर निर्भर सोयाबीन की फसल पर आश्रित रहा है, जिसमें अक्सर कीटों और मौसम की मार से नुकसान का जोखिम बना रहता है। ऐसे में सूरजमुखी भविष्य में सोयाबीन के एक मजबूत और टिकाऊ विकल्प के तौर पर उभरी है। सूरजमुखी की यह तिलहनी फसल महज 90 से 100 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। एक बीघा खेत में मात्र 1.5 किलो बीज की आवश्यकता होती है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 2,500 से 3,000 रुपये प्रति किलो है। पूरी तरह से जैविक (ऑर्गेनिक) पद्धति से उगाई गई इस फसल से गुणवत्ता और उत्पादन, दोनों ही स्तरों पर उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत में बढ़ी मांग भारत अपनी सूरजमुखी तेल (सनफ्लावर ऑयल) की जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर यूक्रेन पर निर्भर था। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इसके अंतरराष्ट्रीय आयात पर असर पड़ा, जिससे घरेलू बाजार में सूरजमुखी की मांग और कीमतें दोनों काफी बढ़ गईं। फसल में फूल आने के साथ ही कई प्रमुख खाद्य तेल कंपनियों ने किसान से सीधे खेत से ही उपज खरीदने (डायरेक्ट बायबैक) के लिए संपर्क साधना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, सूरजमुखी के बीजों का उपयोग न केवल तेल निकालने में, बल्कि रोस्टेड स्नैक्स, बेकरी, सलाद और विभिन्न वैल्यू-एडेड फूड प्रोडक्ट्स में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। ये भी पढ़ें-उज्जैन:सिंहस्थ की 80 फीट रोड के आड़े आया आसाराम बापू का आश्रम, सैकड़ों अनुयायियों ने चलाया हस्ताक्षर अभियान महाकाल के श्रद्धालुओं के लिए बना नया आकर्षण और सेल्फी पॉइंट लालपुर क्षेत्र में सौ बीघा से अधिक क्षेत्र में फैली यह पीली चादर न केवल आसपास के किसानों के लिए कौतुक का विषय है, बल्कि राहगीरों का मन भी मोह रही है। बाबा महाकाल के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु और स्थानीय लोग इस नजारे को देखकर ठिठक जाते हैं। खेतों में खिलखिलाते बड़े-बड़े पीले फूलों के साथ तस्वीरें खिंचवाने और रील्स बनाने के लिए लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है। यह खेत अब एक लोकप्रिय सेल्फी पॉइंट और प्राकृतिक आकर्षण का केंद्र बन चुका है। दूर-दराज से किसान इस नई तकनीक और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को समझने के लिए ऋषभ पंड्या के पास पहुंच रहे हैं। खेती में नए दौर की शुरुआत युवा किसान ऋषभ पंड्या के अनुसार, यह प्रयोग मालवा के किसानों को पारंपरिक खेती के ढर्रे से बाहर निकालकर अतिरिक्त आमदनी का जरिया देने के लिए किया गया था। इसके परिणाम बेहद सकारात्मक रहे हैं। उज्जैन में सूरजमुखी की यह पहली बड़ी और सफल ऑर्गेनिक खेती मालवा-निमाड़ अंचल के किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि और फसल विविधीकरण का एक नया रास्ता खोल रही है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Sep 03, 2026, 05:07 IST
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