छीन ली मुख्यमंत्री की कुर्सी: कैसे यहां तक पहुंचे शिवकुमार? चुनौतियों को अवसरों में बदलते रहे हैं सिद्धारमैया
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बनने जा रहे कांग्रेस के संकटमोचक डीके शिवकुमार के लिए सत्ता पाना कभी आसान नहीं रहा। वैसे तो, 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनते समय ही तय कर लिया गया था कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहेंगे। लेकिन नवंबर 2025 में जब समयसीमा करीब आई तो सिद्धारमैया इससे मुकर गए। आखिरकार, छह माह तक चली सियासी खींचतान के बाद शिवकुमार अपनी महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाने में सफल रहे। यह पहला मौका नहीं हैं, जब उन्होंने अपना हक पाने के लिए पूरी दृढ़ता के साथ राजनीतिक दांवपेचों का सहारा लिया हो। वह एक बार खुद कह चुके हैं, सत्ता मिलती नहीं है, इसे छीनना पड़ता है। दरअसल, 1999 में जब एसएम कृष्णा मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे थे तो उनके साथ मिलकर मंत्रियों की सूची शिवकुमार ने ही तैयार कराई थी। इसे आलाकमान को भेजा गया और जब अंतिम सूची आई तो शिवकुमार का नाम उसमें नहीं था। उन्होंने जरा भी देर नहीं लगाई और कृष्णा को रात में सोते से जगाकर आखिरी क्षणों में अपना नाम मंत्री की सूची में शामिल कराया। कुछ ऐसा ही दृढ़ संकल्प उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने में दिखाया और हर जोड़तोड़ आजमाने के बाद प्रतिद्वंद्वी सिद्धारमैया की जगह लेने जा रहे हैं। 27 वर्ष की उम्र में पहुंचे विधानसभा डोड्डलाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार का जन्म 15 मई, 1962 को कनकपुरा के एक संपन्न परिवार में हुआ था। 1980 के दशक में छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में पहला कदम रखा। 1985 के विधानसभा चुनाव में दिग्गज नेता एचडी देवेगौड़ा के सामने हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1989 में महज 27 वर्ष की आयु में सथानूर निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। 2008 के बाद से वह कनकपुरा से चुनाव लड़ते रहे हैं। तिहाड़ पहुंचकर चुकाई थी कीमत 2017 में उन्होंने विधायकों को पनाह दी तब आयकर अधिकारियों ने कई जगहों पर छापे मारे, जिनमें उनका अपना घर और उनके भाई व सांसद डीके सुरेश का घर भी शामिल था। उनके कारोबारी ठिकानों की भी तलाशी ली गई। दो साल बाद, उन्हें ईडी ने गिरफ्तार कर लिया; इस तरह वह कर्नाटक के पहले ऐसे प्रमुख राजनेता बन गए जिन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया। 50 दिनों बाद रिहा होने पर कांग्रेस के मजबूत चेहरे के तौर पर उनकी स्थिति और मजबूत हुई। चुनौतियों को अवसरों में बदलते रहे हैं सिद्धारमैया वहीं, वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धारमैया, जनता दल (सेक्युलर) नेता एचडी देवगौड़ा और भाजपा के बीएस येदियुरप्पा राज्य के अब तक के सबसे बड़े जननेताओं में गिने जाते हैं। सिद्धारमैया अपने जोशीले और ठेठ ग्रामीण हास्य से भरे भाषणों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कांग्रेस सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर दिया गया उनका आखिरी सार्वजनिक भाषण उनके अपने मानकों के हिसाब से काफी फीका था। सिद्धरमैया का सियासी सफर विरोध और जुझारूपन की एक गाथा है। चुनौतियों को अवसरों में बदलने में माहिर सिद्धरमैया ने जदएस से अपने निष्कासन का इस्तेमाल कर्नाटक के पिछड़े समुदायों के एक लोकप्रिय नेता के तौर पर उभरने के लिए किया। एजेंसी 1983 में विधायकी से शुरू हुआ सफर सिद्धारमैया का जन्म 3 अगस्त, 1947 को मैसूर के पास सिद्धारमनहुंडी में हुआ था। वह कुरुबा समुदाय से आते हैं, जो एक पशुपालक समूह है और कर्नाटक की जाति व्यवस्था में पारंपरिक रूप से हाशिये पर रहा है। बीएससी और एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक लेक्चरर के तौर पर काम किया। 1983 में, उन्होंने लोक दल के टिकट पर चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जदएस से निकाला जाना निर्णायक मोड़ साबित हुआ जदएस से सिद्धारमैया को निकाला जाना निर्णायक मोड़ साबित हुआ। सिद्धारमैया ने कांग्रेस में शामिल होकर अपने साथ एक मजबूत जमीनी आधार और अहिंदा सम्मेलन (अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित) के जरिये माहौल बनाया, जिसने कर्नाटक में सामाजिक न्याय की अवधारणा को पूरी तरह से बदल दिया। न केवल कर्नाटक के मंत्री सतीश जारकीहोली जैसे कद्दावर नेताओं ने पाला बदला, बल्कि क्षेत्रीय पार्टी के प्रति वफादार कई समुदायों ने भी अपनी निष्ठा सिद्धारमैया की ओर मोड़ ली।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 29, 2026, 06:28 IST
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