पर्यावरण: आंखें बंद करने से खतरा नहीं टलेगा, जलवायु परिवर्तन को झुठलाने की कोशिशों के नतीजे भयावह

जलवायु परिवर्तन की लड़ाई अब सिर्फ उत्सर्जन कटौती की नहीं रह गई है, बल्कि सच और भरोसे की भी बन चुकी है। दुनिया के लगभग सभी विकासशील और एशियाई देश इसकी मार से पीड़ित हैं। वर्ष 2025 ने जलवायु संकट की वह तस्वीर रखी, जिसे नजरअंदाज करना अब नामुमकिन है। क्रिश्चियन एड की नई रिपोर्ट काउंटिंग द कॉस्ट 2025 बताती है कि बीते वर्ष जलवायु से जुड़ी आपदाओं की वजह से दुनिया को 120 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ। आज से करीब दो दशक पहले जैसे यह कहा जाता था कि सिगरेट से कोई खास नुकसान नहीं होता, वैसे ही अब कोई यह नहीं कहता कि जलवायु परिवर्तन हो ही नहीं रहा, बल्कि अब कहा जा रहा है कि यह उतना गंभीर नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में जीवाश्म ईंधन का समर्थन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जीवाश्म ईंधन उद्योग का सार्थक जलवायु कार्रवाइयों को अवरुद्ध करते हुए गलत सूचना व भ्रामक जानकारी फैलाने का लंबा इतिहास रहा है। अब क्लाइमेट डिनायल, यानी जलवायु परिवर्तन को नकारना, का तरीका बदल गया है। पहले इसे पूरी तरह झुठलाया जाता था, पर अब ऑनलाइन व सोशल मीडिया के जरिये इसके असर को कम बताने की कोशिशें हो रही हैं। जब वैज्ञानिकों ने सिगरेट को कैंसर के लिए जिम्मेदार बताया, तब भी उसके पैरोकारों ने सच पर पर्दा डालने की कोशिश की और यह लड़ाई लंबे समय तक खींचने के बाद तय हुआ कि अब सिगरेट की बिक्री पर रोक की जगह उसके पैकेट पर चेतावनी लिखी होगी कि धूम्रपान से कैंसर होता है। यानी भले ही कैंसर हो, पर इसे रोकेंगे नहीं। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप-28) में शामिल हुए जीवाश्म ईंधन के पैरोकारों की तादाद, दुनिया के दस सबसे ज्यादा जलवायु-संवेदनशील देशों के सभी प्रतिनिधियों की संयुक्त संख्या (1,509) से भी कहीं अधिक थी। जीवाश्म ईंधन के समर्थकों की बढ़ती संख्या का अंदाजा हाल में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप-30 से भी लगाया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण आए भीषण समुद्री तूफान से तबाह हो चुके जमैका के हर एक प्रतिनिधि के मुकाबले वहां करीब 40 जीवाश्म ईंधन समर्थक मौजूद थे। यह इस बात को रेखांकित करता है कि जलवायु संकट से सीधे जूझ रहे देशों के प्रतिनिधियों की तुलना में उद्योग से जुड़े लोगों की मौजूदगी कहीं ज्यादा थी। इनके ज्यादा संख्या में जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में हिस्सा लेने का मतलब साफ-साफ, नीति निर्धारकों को गुमराह करने का षड्यंत्र है। 2025 में दुनिया भर में कम से कम दस ऐसी बड़ी जलवायु आपदाएं हुईं, जिनमें से हर एक ने एक अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान किया। कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग अकेले 60 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान कर गई। वहीं दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में आए तूफानों तथा बाढ़ ने 1,700 से ज्यादा लोगों की जान ली और उससे करीब 25 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। भारत और पाकिस्तान में आई भीषण बाढ़ ने 1,860 से अधिक लोगों की जान ली और करीब 5.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। रिपोर्ट बताती है कि एशिया दुनिया के उन हिस्सों में शामिल रहा, जहां सबसे ज्यादा तबाही दर्ज की गई, जबकि इन देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान अपेक्षाकृत कम है। रिपोर्ट साफ कहती है कि ये आपदाएं प्राकृतिक नहीं हैं, बल्कि दशकों से जारी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और राजनीतिक टालमटोल का नतीजा हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि आर्थिक नुकसान के आंकड़े अमीर देशों में ज्यादा दिखाई देते हैं, क्योंकि वहां बीमा और संपत्ति का दायरा बड़ा होता है। पर असली पीड़ा गरीब देशों में होती है, जहां लोग अपना सब कुछ खो देते हैं, फिर भी आंकड़ों में उनकी तकलीफ पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाती। नाइजीरिया, कांगो, ईरान व अफ्रीका के कई हिस्सों में आई आपदाएं इसका उदाहरण हैं। किक बिग पॉल्यूटर्स आउट गठबंधन के अनुसार, कॉप-30 में जीवाश्म ईंधन के पैरोकारों की संख्या बाकू व अजरबैजान में हुई जलवायु वार्ता की तुलना में 12 फीसदी अधिक थी, जो अब तक सबसे बड़ी संख्या भी थी। इसका मतलब यह है कि जहां दुनिया के नेता जलवायु संकट से जूझती पृथ्वी के भविष्य को बचाने के उपाय तलाश रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों द्वारा सामने रखे गए जलवायु परिवर्तन के सच को कमजोर साबित करने व उसके असर को कम दिखाने की कोशिशें लगातार चल रही हैं। अब वक्त आ गया है, जब कॉप जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डिजिटल दायित्व को एक औपचारिक एजेंडा बनाया जाए, ताकि झूठ के व्यापार को रोका जा सके। डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी जवाबदेह ठहराया जाए। सिर्फ फेक न्यूज या भ्रामक जानकारियों को हटाना काफी नहीं है, बल्कि हमें उस व्यवस्था को बदलना होगा, जो इन्हें पनपने देती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जलवायु विज्ञान और नीति के खिलाफ सुनियोजित भ्रामक अभियानों ने विश्व भर में नीतिगत निर्णयों को प्रभावित किया है। ये न सिर्फ गलत जानकारी फैलाते हैं, बल्कि लोगों के भरोसे को भी कमजोर करते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 21, 2026, 04:01 IST
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