मुक्त व्यापार समझौते: यह तो बस शुरुआत है, इसकी पैमाइश का आधार बनेगा विश्व बाजार में भारत का हिस्सा

भारत के हाल ही में यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ हुए बड़े व्यापार समझौते या समझौतों पर सहमति महत्वपूर्ण है। इससे पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही अमेरिकी संरक्षणवादी नीति का रुख बदला है, जिसमें आयात पर ज्यादा पाबंदियां और टैक्स लगाए जा रहे थे। यूरोप और अमेरिका मिलकर दुनिया के करीब 45 प्रतिशत कम कुशल विनिर्माण उत्पाद- जैसे कपड़े, जूते और असेंबल्ड इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात करते हैं। यही वे क्षेत्र हैं, जहां भारत के करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल सकता है। यह लगभग 50 खरब डॉलर का बाजार है। पिछले कई वर्षों तक भारत इस अवसर से वंचित रहा। बांग्लादेश को यूरोप में शून्य शुल्क पर कपड़ा बेचने की सुविधा थी। वियतनाम ने 2020 में यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) किया था। इसके उलट भारत के निर्यातकों को कपड़ों पर 10-12 प्रतिशत और जूतों पर 17 प्रतिशत तक टैक्स देना पड़ता था। ऐसे क्षेत्रों में जहां मुनाफा बहुत कम होता है, ये आयात कर भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुए। बाद में अमेरिका के भारी टैरिफ ने यह चिंता और बढ़ा दी। नए समझौतों के बाद यह फर्क अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। भारतीय निर्यातकों को यूरोप में शून्य शुल्क पर अपना उत्पाद बेचने की सुविधा मिलेगी और अमेरिका में 18 प्रतिशत की दर पर अपना उत्पाद बेचने की सुविधा मिलेगी- जो चीन (34 प्रतिशत) और वियतनाम-बांग्लादेश (20 प्रतिशत) से बेहतर है। कई वर्षों के बाद पहली बार भारतीय कंपनियां बड़े बाजारों में बराबरी की शर्तों पर मुकाबला करेंगी। इसके लिए निश्चित रूप से केंद्र की मोदी सरकार श्रेय की हकदार है। इन समझौतों से दुनिया की बड़ी कंपनियों का नजरिया भी बदलेगा। यूरोप और अमेरिका में भारतीय उत्पादों के निर्यात से जुड़ी नीतियों में स्थिरता आने के कारण अब कंपनियां भारत में बड़े निवेश पर विचार कर सकती हैं। 'चाइना-प्लस-वन' रणनीति में भारत फिर से एक मजबूत विकल्प बन गया है। भारत के सामने निर्यात का एक बहुत बड़ा, अभी तक न इस्तेमाल हुआ मौका है। यूरोप और अमेरिका में कम कुशल विनिर्माण उत्पादों के निर्यात की अगर श्रम-शक्ति से तुलना करें, तो बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया लगभग अपनी पूरी क्षमता तक निर्यात कर रहे हैं। चीन तो अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा निर्यात करता है। लेकिन भारत अपनी क्षमता से करीब 18 प्रतिशत पीछे है- यानी हर साल लगभग 300 अरब डॉलर का अतिरिक्त निर्यात अब भी संभव है। मुक्त व्यापार समझौतों पर दस्तखत करना पहला कदम है। लेकिन इससे अपने-आप नतीजे नहीं मिलते। इसके लिए चार मोर्चों पर काम करना होगा। पहली चुनौती है- मानक (स्टैंडर्ड्स)। आज दुनिया में सिर्फ टैरिफ नहीं, बल्कि उत्पाद सुरक्षा, पर्यावरण नियम और गुणवत्ता प्रमाणन यह तय करते हैं कि माल बिकेगा या नहीं। अगर एक कंपनी भी नियम तोड़ती है, तो पूरे क्षेत्र की साख को नुकसान पहुंचता है। भारत में फार्मा, झींगा और कृषि उत्पादों के मामलों में ऐसा पहले हो चुका है। उद्योग संगठनों को खुद इस मामले में निगरानी बढ़ानी होगी। केंद्र और राज्य सरकारों को परीक्षण प्रयोगशाला और तकनीकी मदद देनी होगी। बेहतर है कि खराब माल भारत में ही निरस्त हो जाएं, न कि यूरोप पहुंचकर। दूसरी चुनौती है- पेचीदा नियम। भारत की टैरिफ व्यवस्था जरूरत से ज्यादा उलझी हुई है। ब्रिटेन के साथ हुए नए मुक्त व्यापार समझौते में उसकी अनुसूची में सिर्फ तीन श्रेणियां हैं- शून्य शुल्क, बिना छूट, और कोटा के साथ शून्य शुल्क। इसके उलट भारत की सूची में बीस से ज्यादा श्रेणियां हैं। मोस्ट फेवर्ड नेशन (तरजीही राष्ट्र) टैरिफ में भी 140 से ज्यादा दरें हैं। इतने जटिल नियमों से आयात-निर्यात मुश्किल हो जाता है और विवाद बढ़ते हैं। हाल में वॉक्सवैगन पर 1.4 अरब डॉलर का जुर्माना इसी वजह से लगा, क्योंकि उसने ऑटो पार्ट्स अलग-अलग कंसाइनमेंट में मंगाए। सही-गलत जो भी हो, ऐसे मामलों से भारत की छवि खराब होती है और निवेशक हिचकिचाते हैं। तीसरी चुनौती है- इनपुट और मशीनों की लागत। मुक्त व्यापार समझौते बाजार खोलते हैं, लेकिन सस्ती मशीनें नहीं दिलाते। अगर तरजीही राष्ट्र के टैरिफ ऊंचे रहेंगे, तो उद्योग महंगी मशीनें खरीदेंगे और लागत बढ़ेगी, क्योंकि कुछ मशीनें उन देशों से आती हैं, जिनके साथ हमारा कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं है। जरूरत से ज्यादा संरक्षण पूरी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देता है। चौथी चुनौती है- अपने ही समझौतों को कमजोर करना। भारत पहले भी मुक्त व्यापार समझौते के बाद एंटी-डंपिंग ड्यूटी और क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) लगाता रहा है, जैसे इंडोनेशिया से मानव-निर्मित फाइबर के मामले में। क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर भारत सरकार द्वारा विशिष्ट उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन मानकों को सुनिश्चित करने के लिए जारी किए गए कानूनी नियम हैं। इससे कुछ लोगों को फायदा हुआ, लेकिन पूरे गारमेंट सेक्टर को नुकसान पहुंचा। ऐसे फैसलों से विदेशी कंपनियों का भारत की नीतियों की स्थिरता पर भरोसा कम होता है। आखिर में, भारत के मुक्त व्यापार समझौतों की सफलता भाषणों से नहीं आंकी जाएगी। उसे सिर्फ एक पैमाने पर मापा जाएगा- कि दुनिया के बाजार में भारत का हिस्सा कितना बढ़ता है। मौका बहुत बड़ा है। लेकिन उसे हासिल करने के लिए भरोसा बनाना होगा- बेहतर मानक, सरल नियम, सस्ते इनपुट और स्थिर विदेशी व्यापार नीति के जरिये। तभी ये मुक्त व्यापार समझौते भारत की निर्यात और प्रगति की कहानी में असली जीत की शुरुआत बनेंगे। -लेखक जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, अमेरिका में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। - edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 11, 2026, 07:56 IST
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