जानना जरूरी है: संस्कृति के पन्नों से, समस्त विद्याओं की जननी है गायत्री मंत्र
एक बार नारद ने परमपिता ब्रह्मा से पूछा, प्रभु! गायत्री मंत्र का क्या लक्षण है, उसके प्रत्येक अक्षर का क्या गुण है इस मंत्र की महिमा के विषय में आप मुझे विस्तार से बताइए। ब्रह्मा जी बोले, वत्स! गायत्री-मंत्र का छंद गायत्री है और उसके देवता सविता निश्चित किए गए हैं। गायत्री देवी का वर्ण शुक्ल है, उनका मुख अग्नि है और उनके ऋषि विश्वामित्र हैं। ब्रह्मा जी उनके मस्तक में स्थित हैं, रुद्र उनकी शिखा और श्रीविष्णु उनका हृदय हैं। उपनयन-कर्म में उनका विनियोग होता है। गायत्री देवी सांख्यायन गोत्र में उत्पन्न हुई हैं। तीनों लोक उनके तीन चरण हैं और पृथ्वी उनके उदर में स्थित है। पैर से लेकर मस्तक तक शरीर के चौबीस स्थानों में गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों का न्यास करने से द्विज ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। प्रत्येक अक्षर के देवता का ज्ञान होने पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। अब गायत्री मंत्र का दूसरा लक्षण सुनो। यह अठारह अक्षरों का यजुर्मंत्र है, जिसका आरंभ अग्नि शब्द से और समाप्ति स्वाहा पर होती है। जल में खड़े होकर इस मंत्र का सौ बार जप करना चाहिए। इससे असंख्य पाप नष्ट हो जाते हैं और जप करने वाला महापापों से मुक्त होकर उत्तम लोक को प्राप्त करता है। यह मंत्र है-ॐ अग्नेर्वाक्पुंसि यजुर्वेदेन जुष्ठा सोमं पिब स्वाहा। विष्णु-मंत्र, माहेश्वर महामंत्र, देवी-मंत्र, सूर्य-मंत्र, गणेश-मंत्र और अन्य देवताओं के मंत्रों का जप करने से भी मनुष्य श्रेष्ठ गति पाता है। जो ब्राह्मण जप-परायण है, वह साक्षात ब्रह्मस्वरूप है और उसका पूजन करना चाहिए। प्रत्येक पर्व पर विधिपूर्वक दान देने से दाता को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण स्वाध्याय करता है, स्वयं पढ़ता है, दूसरों को पढ़ाता है और धर्म, सदाचार, श्रुति, स्मृति तथा पुराणों का श्रवण करता है, वह पृथ्वी पर श्रीविष्णु के समान माना गया है। उसका बल अक्षय होता है और उसका पूजन करने से विष्णुधाम की प्राप्ति होती है। जो द्विज प्रतिदिन प्राणायामपूर्वक गायत्री मंत्र का जप करता है और प्रत्येक अक्षर का उसके देवता सहित अपने शरीर में न्यास करता है, वह करोड़ों जन्मों के पापों से मुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। इसलिए नारद को भी प्राणायाम सहित गायत्री-जप करने की प्रेरणा दी गई। नारद ने प्राणायाम और न्यास का स्वरूप पूछा। ब्रह्मा जी ने बताया कि गुदा में अपान और हृदय में प्राण स्थित है। गुदा को संकुचित कर पूरक द्वारा अपान को प्राण में मिलाना चाहिए, फिर कुंभक और रेचक करना चाहिए। प्रत्येक क्रिया के साथ मंत्र-जप आवश्यक है। तीन प्राणायामों के बाद गायत्री-जप करने से महापातक नष्ट हो जाते हैं। गायत्री के चौबीस अक्षरों के देवता क्रमशः अग्नि, वायु, सूर्य, आकाश, यम, वरुण, बृहस्पति, पर्जन्य, इंद्र, गंधर्व, पूषा, मित्र, त्वष्टा, वसु, मरुद्गण, सोम, अंगिरा, विश्वेदेवा, अश्विनी कुमार, प्रजापति, समस्त देवता, रुद्र, ब्रह्मा और श्रीविष्णु हैं। इनके ज्ञान से संपूर्ण वाङ्मय का बोध होता है। अक्षरों का न्यास पैर के अंगूठे से लेकर मस्तक तक क्रमशः किया जाता है। ऐसा करने वाला ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप बनकर परम शांति प्राप्त करता है। जो गायत्री मंत्र को संपूर्ण बीजों सहित जानता है, वह चारों वेदों, योग और तीनों प्रकार के जप का ज्ञाता माना गया है। जो इसे नहीं जानता, उसका समस्त शुभ कर्म निष्फल हो जाता है। गायत्री मंत्र को मोक्षदायिनी कहा गया है और उसे समस्त विद्याओं की जननी माना गया है। यह मंत्र केवल पापों का नाश ही नहीं करता, बल्कि बुद्धि को शुद्ध कर विवेक को जाग्रत करता है। दस बार जप से वर्तमान जन्म, सौ बार जप से पूर्व जन्म और हजार बार जप से अनेक युगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा, नियम और संयम के साथ नित्य गायत्री मंत्र का स्मरण करता है, उसका जीवन तेजस्वी, धर्ममय और कल्याणकारी बन जाता है तथा अंत में वह स्वर्ग और मोक्ष, दोनों को प्राप्त करता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 18, 2026, 06:18 IST
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