गोपालदास 'नीरज': आज बसंत की रात, गमन की बात न करना
आज बसंत की रात, गमन की बात न करना! धूप बिछाए फूल-बिछौना, बगिय़ा पहने चांदी-सोना, कलियां फेंके जादू-टोना, महक उठे सब पात, हवन की बात न करना! आज बसंत की रात, गमन की बात न करना! बौराई अंबवा की डाली, गदराई गेहूं की बाली, सरसों खड़ी बजाए ताली, झूम रहे जल-पात, शयन की बात न करना! आज बसंत की रात, गमन की बात न करना। खिड़की खोल चंद्रमा झांके, चुनरी खींच सितारे टांके, मन करूं तो शोर मचाके, कोयलिया अनखात, गहन की बात न करना! आज बसंत की रात, गमन की बात न करना। नींदिया बैरिन सुधि बिसराई, सेज निगोड़ी करे ढिठाई, तान मारे सौत जुन्हाई, रह-रह प्राण पिरात, चुभन की बात न करना! आज बसंत की रात, गमन की बात न करना। यह पीली चूनर, यह चादर, यह सुंदर छवि, यह रस-गागर, जनम-मरण की यह रज-कांवर, सब भू की सौगा़त, गगन की बात न करना! आज बसंत की रात, गमन की बात न करना। हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 31, 2026, 12:08 IST
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