हारिस बिलाल: हमारे रास्ते में कोई मजबूरी नहीं आती

हमारे रास्ते में कोई मजबूरी नहीं आती ख़ुदा का शुक्र है दुनिया हमें पूरी नहीं आती यहाँ साँसें कमाने का भी इतना बोझ होता है मशक़्क़त जिस्म खा जाती है मज़दूरी नहीं आती मैं उन को एक दूजे की भली बातें बताता हूँ सुना है इस तरह लोगों में मग़रूरी नहीं आती मुझे दरपेश है घर में बसी दुनिया की रखवाली मगर दफ़्तर से इक अफ़सर की मंज़ूरी नहीं आती जो सज्दों में रखे जाएँ वो नेज़ों पर भी आते हैं ख़ुदा के नाम-लेवाओं पे मा'ज़ूरी नहीं आती मैं उस मजमा' का हिस्सा हूँ जहाँ लोगों के हिस्से में बदन पर पूरे कपड़े हों तो मश्हूरी नहीं आती बहुत नज़दीक होना भी वफ़ा का 'ऐब है 'हारिस' ज़रा से फ़ासले पर दरमियाँ दूरी नहीं आती हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 01, 2026, 11:07 IST
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