क्या ईरान का खतरा टल गया: रूस-चीन और इस्लामिक देशों के समीकरण में कितना बदला माहौल? अमेरिका को घेरने की तैयारी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी देना भले की बंद कर दिया है, लेकिन उनके मूल इरादे जस के तस हैं। उधर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने राष्ट्रपति ट्रंप को सीधे अपराधी करार दिया है। देश के राजनयिकों का कहना है कि यह एक तूफान के गुजर जाने जैसी स्थिति है, लेकिन इससे बड़े तूफान आने का अंदेशा बरकरार है। एक पूर्व विदेश सचिव भी कहते हैं कि मुख्य समस्या तो जस की तस है। ईरान ने कैसे किया मंडराए खतरे का सामना अली खामेनेई कहते हैं कि ईरान में विरोध प्रदर्शन के बवंडर के लिए अमेरिका जिम्मेदार है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और एजेंसियां भी ईरान में हिंसक प्रदर्शन के धीमा पड़ने की खबर दे रही हैं। रूस में बैठे सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकार विनोद शर्मा कहते हैं कि ईरान में प्रदर्शन को रोकने में शिया मिलिशिया ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस्लामिक मिलिशिया ने भी इसे बहुत संवेदनशीलता से लिया। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने भी अमेरिका और इस्राइल को निर्णायक संदेश देने में कोई हिचक नहीं दिखाई। बताते हैं इराक की शिया मिलिशिया ने भी ईरान को समर्थन दिया। इराक के बसरा आदि क्षेत्र से जमीन के रास्ते शिया लड़ाकों ने ईरान का रुख किया था। इसके अलावा ईरान ने विश्वभर के मित्र देशों से खास पहल की। रणनीतिक और सामरिक मामले के वरिष्ठ सूत्र ने कहा कि बात इतनी नहीं थी। अस्तित्व के बचाव में ईरान भी अपना आक्रामक विकल्प तैयार कर चुका था। ईरान हवाई सुरक्षा प्रणाली, हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली समेत अन्य को सक्रिय कर चुका था। इसका अमेरिका के मध्य एशिया और इसके आस-पास 19 सैन्य बेसों तथा इस्राइल पर सीधा हमले का खतरा मंडरा रहा था। माना जा रहा है कि ईरान के हमले से संभावित नुकसान अमेरिकी रणनीतिकारों को भी चेता रहे थे। कितने खतरनाक हैं ईरान के आईआरजीसी आरजीसी(इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स) ईरान की 1.5-2 लाख लड़ाकों की इलिट फोर्स है। ईरान की सेना देश के संप्रभुता की रक्षा करती है, लेकिन 1979 में गठित आरजीसी ईरान की एकता, अखंडता को बनाए रखने के लिए समर्पित है।यह सर्वोच्च नेता के अधीन काम करती है। इसे ईरान की सबसे प्रशिक्षित उच्चस्तरीय कमांडरों की फोज माना जाता है। इराक(बगदाद) में 3 जनवरी 2020 को अमेरिकी हमले के दौरान मारे गए ईरान के मेजर जनरल सुलेमानी ने इस क्षेत्र में बड़ा काम किया था। कुद्दस फोर्स सीधे खामेनेई को रिपोर्ट करती थी और फिलिस्तीन के संगठन हमास, लेबनान के हिजबुल्ला और यमन के हूती संगठन के अलावा इराक की पापुलर मोबलाइजेशन फोर्सेज(पीएमएफ) को खड़ी करने में जनरल सुलेमानी ने अहम भूमिका निभाई थी। वह पश्चिम एशिया में ईरान के समर्थन से तमाम प्राक्सी खड़ा करने के रणनीतिकारों में थे और अमेरिकी स्टेट्रजी प्लानर भी जनरल सुलेमानी से खौफ खाते थे। माना जा रहा है कि इन्हीं प्राक्सीज के लड़ाकों के जरिए ईरान ने आतंरिक विरोध प्रदर्शन को निर्ममता के साथ कुचल दिया। भारतीय वायुसेना के पूर्व एयरवाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि ईरान को निर्ममता से इसे कुचलने के लिए रूस के राष्ट्रपति की पहल पर सुरक्षित अवसर मिल सका। ये भी पढ़ें:Iran Unrest: ट्रंप से मिला धोखा! ईरान में प्रदर्शनकारियों ने जताई निराशा, बोले- हमें उम्मीद थी, मदद आएगी खतरा टला है, खत्म नहीं हुआ एनबी सिंह कहते हैं कि ईरान के सिर से खतरा टला है, खत्म नहीं हुआ। ईरान से तनाव की असल जड़ में इस्राइल है। इस्राइल को पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा खतरा ईरान से ही नजर आता है। जून 2025 में दोनों देशों का टकराव अंतिम मोड़ तक पहुंच चुका था। ईरान अमेरिका के नियंत्रण से बाहर है। दूसरे अमेरिका को परमाणु हथियार से संपन्न ईरान नहीं चाहिए। ईरान के अमेरिकी दबाव में परमाणु कार्यक्रम रोक देने की कोई संभावना नहीं है। दूसरी तरफ ईरान के रूस और चीन से गहराई का रिश्ता है। यूक्रेन पर हमले के दौरान ईरान ने रूस की काफी सहायता की है। सीरिया में दोनों देश मिलकर बशर अल असद की सरकार को समर्थन दे रहे थे। मध्य एशिया में शक्ति संतुलन के लिहाज से भी ईरान की भूमिका है। अमेरिकी रणनीतिकार भी आसानी से चुप नहीं बैठते। बताते हैं मध्य एशिया में चुनौतियों को ध्यान में रखकर अमेरिका सैन्य तैयारी को और मजबूत बनाने पर काम कर रहा हैं। इस टकराव को कोई चिनगारी फिर भड़का सकती है। अमेरिका के लिए है चिंता की बात कूटनीति, सामरिक रणनीति और भू-राजनीतिक मामलों के जानकार ट्रंप शासन में एक बदलाव को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। एक राजनयिक का कहना है कि ट्रंप राज में अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना भरोसा खोया है। यूरोप के देश खासकर जर्मनी सुरक्षा को लेकर विकल्प तैयार कर रहे हैं। सऊदी अरब तुर्किए के नजदीक जा रहा है और पाकिस्तान, सऊदी अरब तुर्किए में रक्षा क्षेत्र को लेकर सहमति निश्चित रूप से अमेरिकी रणनीतिकारों की निगाह में है। भारत के साथ अमेरिका का रिश्ता बहुत आगे निकल चुका था, लेकिन ट्रंप की ट्रेड डील और उनके रवैये ने इसे भी बड़ा झटका दिया है। सबसे खास बात है कि पिछले सात महीने से भारत में अमेरिका का कोई राजदूत नहीं था और हाल में आया है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के स्टेट विभाग को काफी कमजोर कर दिया है। एक स्पष्टता का अभाव है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 18, 2026, 15:24 IST
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