सिर्फ डाटा से तस्वीर नहीं सुधरने वाली: स्वास्थ्य सेवा में सुधार असली चुनौती, नीतियों में बदलाव का वक्त
भारत में हेल्थ सर्वे का डाटा जारी होने के साथ एक अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है। सर्वे के नतीजे असल में उस चीज के ठीक उलट काम करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए। सर्वे रिपोर्ट उन बातों को ही सामने लाती हैं, जिन्हें हम पहले से जानते हैं। शायद ही कभी इनके आधार पर तुरंत कोई कार्यक्रम शुरू किया जाता है। हाल ही में जारी स्वास्थ्य से जुड़े दो सर्वे-नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 और नेशनल हेल्थ अकाउंट्स 2022-23 के मामले में भी ऐसा ही लगता है। इन दोनों सर्वे से नीति बनाने वालों और नागरिकों को बेहतर समझ मिलनी चाहिए थी, पर वही पुरानी कहानी दोहराई जाती दिखती है। सर्वे का महत्व इसमें नहीं है कि क्या काम किया गया, बल्कि यह दिखाने में है कि कार्यक्रम कहां कमजोर है और पुरानी रणनीतियां कहां नाकाफी हैं। व्यावसायिक समूहों ने भी सेहत से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों की ओर इशारा किया है और उन्हीं के आधार पर अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया है। जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े संदेश कमजोर हैं और निजी स्वास्थ्य बाजार आक्रामक हैं, वहां हर सर्वे के नतीजे को व्यवसाय के मौके में बदला जा सकता है। अच्छी बात है कि प्रिंट मीडिया ने उन मुद्दों को व्यापक कवरेज दी है, जो नागरिकों के लिए मायने रखते हैं: जैसे मोटापा, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और अन्य गैर-संचारी (एनसीडी) रोग। हालांकि, इनमें से ज्यादातर बातें पहले से ही पता थीं। मोटापा और अन्य एनसीडी अब सभी सामाजिक व आर्थिक वर्गों में फैल गए हैं। फिर भी, इन सर्वे के नतीजों और नीतियों पर गंभीरता से चर्चा नहीं हो रही है, जो चिंतनीय है। हेल्थ सर्वे का मकसद पुरानी समस्याओं को याद दिलाना भर नहीं होता है। इसका मकसद तो सुधार के लिए जरूरी कदम उठाना होता है। इन सर्वे का विश्लेषण धीमा होता है, क्योंकि कच्चा डाटा आसानी से नहीं मिलता और अक्सर इसे काफी समय बाद साझा किया जाता है। ऐसे में, नीति निर्माता अक्सर यह कहकर विश्लेषण करने से बचते हैं कि डाटा पुराना है। इस तरह डाटा अपनी अहमियत खो देता है। जब इसे जारी किया जाता है, तो यह ऐसी हालत में होता है कि इसका गहराई से मतलब नहीं निकाला जा सकता। नतीजतन, कुछ करने का मौका हाथ से निकल जाता है। डाटा से सेहत तभी बेहतर होती है, जब उसे सही नीतिगत फैसलों से जोड़ा जाए। जो देश स्वास्थ्य सबंधी डाटा का सही इस्तेमाल करते हैं, उनके पास ऐसे सिस्टम व मजबूत संस्थान होते हैं, जो तेजी से नीतियां तैयार करने, पिछड़े जिलों की पहचान व समीक्षा करने, प्रदर्शन की तुलना करने, संसाधन बांटने और कार्यक्रम में बदलाव लाने का काम करते हैं। इसलिए, डाटा-टू-एक्शन कोई नारा नहीं, एक अनुशासन है, जिसकी भारत को जरूरत है। सबसे पहले, हर बड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 30 दिनों के भीतर सरकार और स्वतंत्र संगठनों द्वारा मिलकर एक राष्ट्रीय व राज्य-स्तरीय एक्शन नोट तैयार किया जाना चाहिए। इसमें ईमानदारी से बताया जाना चाहिए कि क्या सुधार हुआ है, क्या नहीं हुआ है और स्थिति कहां बिगड़ी है। हर बिंदु को एक कार्यक्रम और एक जिम्मेदार अथॉरिटी से जोड़ा जाना चाहिए। दूसरी बात, राज्य स्तर पर स्वास्थ्य डाटा की समीक्षा बैठकें होनी चाहिए। सभी हितधारकों और स्वतंत्र विषय विशेषज्ञों को मिलकर नतीजों की जांच करनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि हमें क्या बदलना होगा तीसरी बात, डाटा का सही और समय पर इस्तेमाल करने के लिए सिस्टम की जरूरत है। भारत ने इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म बनाना शुरू कर दिया है, पर यह मुख्य रूप से रियल-टाइम डाटा के लिए है। चौथा, सर्वे डाटा की प्राइमरी जानकारी और सोर्स फाइलें जल्द उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि स्वतंत्र शोधकर्ता और सरकारी संस्थान तेजी से उसका विश्लेषण कर सकें। पांचवीं बात, नतीजों का असर बजट आवंटन पर पड़ना चाहिए। अगर किसी सर्वे में गैर-संचारी रोगों के मामले बढ़ते दिखते हैं, तो बजट में इसकी रोकथाम और इलाज के लिए प्रावधान होने चाहिए। सरकारी सुविधाओं में जरूरी दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए। अगर बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है, तो स्कूल में स्वास्थ्य, खाने-पीने से जुड़े नियमों और शहरी योजना में इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अक्सर यह कहा जाता है कि स्वास्थ्य संबंधी डाटा जरूरी चीजों को तो छिपाता है, पर गैर-जरूरी चीजों को सामने ले आता है। जबकि इसे एक्स-रे जैसा होना चाहिए। यह तभी काम का होता है, जब इसे सही ढंग से समझा जाए, इस पर ईमानदारी से चर्चा की जाए और फिर काम किया जाए। edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 16, 2026, 03:09 IST
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