UP : हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी- सिर्फ सजा देना कानून का मकसद नहीं, सुधार भी जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया का प्राथमिक उद्देश्य अपराधी को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि उसमें सुधार लाना भी है। इसी के साथ कोर्ट ने 50 साल पुराने आपराधिक मामले में दोषसिद्धी को बरकरार रखते हुए याची को एक वर्ष के अच्छे व्यवहार की शर्त पर प्रोबेशन पर रिहा कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने दिया है। वर्ष 1976 में गाजियाबाद के सिहानी गेट थाना क्षेत्र में याची सुरेश और दो अन्य के खिलाफ मारपीट के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 1984 में सभी को दोषी करार देते हुए एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सुरेश व अन्य ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील लंबित रहने के दौरान दो आरोपियों की मृत्यु हो गई थी। जीवित बचे एकमात्र 73 वर्षीय अभियुक्त सुरेश की अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर से रतन लाल बनाम पंजाब राज्य मामले में स्थापित नजीर का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि दंड देना एक संवेदनशील विवेकपूर्ण कार्य है, न कि कोई यांत्रिक प्रक्रिया।कोर्ट ने अभियुक्त की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी सजा को संशोधित करते हुए उसे जेल भेजने के स्थान पर एक वर्ष के अच्छे आचरण की शर्त पर प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 09, 2026, 11:47 IST
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