कारों में अनिवार्य होगा ऑटोमैटिक ब्रेक: कम होंगे हादसे या बढ़ेगा खतरा? इसके लिए सड़कें कितनी तैयार
सड़क हादसों को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने कारों में आधुनिक सुरक्षा तकनीक अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ड्राफ्ट के मुताबिक 1 अक्टूबर 2030 से सभी नए कार मॉडल में एडवांस्ड इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम यानी AEBS अनिवार्य करने की योजना है। पहले से उत्पादन में मौजूद मॉडल को 1 अक्टूबर 2032 तक इन नियमों का पालन करना होगा। AEBS ऐसा सिस्टम है जो संभावित टक्कर का खतरा पहचानकर ड्राइवर के समय पर ब्रेक नहीं लगाने पर अपने आप ब्रेक लगा सकता है। इसका मकसद दुर्घटना को रोकना या टक्कर की गंभीरता कम करना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत का मौजूदा सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर इस तकनीक का पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार है सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर बन सकता है चुनौती भारत में एक्सप्रेसवे से लेकर भीड़भाड़ वाली शहरी सड़कों तक, ट्रैफिक की परिस्थितियां काफी अलग हैं। कई जगहों पर खराब रोड मार्किंग, अपर्याप्त साइनबोर्ड, गड्ढे, अचानक सड़क पार करते पैदल यात्री और बेतरतीब ट्रैफिक देखने को मिलता है। AEBS की कार्यक्षमता वाहन में लगे कैमरे, रडार, सॉफ्टवेयर और सेंसर की क्षमता पर निर्भर करती है। ऐसे में अचानक लेन बदलते वाहन, दोपहिया चालक और सड़क पर आने वाले पशु सिस्टम के लिए चुनौती बन सकते हैं। हालांकि, इसका प्रदर्शन इस बात पर भी निर्भर करेगा कि संबंधित मॉडल को किस तरह डिजाइन और कैलिब्रेट किया गया है। विश्व बैंक की 2021 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सिर्फ 1 फीसदी वाहन भारत में हैं, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली वैश्विक मौतों का करीब 11 फीसदी यहां दर्ज होता है। इससे देश में सड़क सुरक्षा की चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या हादसे कम होंगे या नया जोखिम पैदा होगा AEBS ड्राइवर की प्रतिक्रिया में देरी होने पर अतिरिक्त सुरक्षा दे सकता है। हालांकि तेज रफ्तार, कम दूरी और खराब बिजिबिलिटी जैसी परिस्थितियों में यह हर दुर्घटना को रोकने में सक्षम नहीं होगा। कुछ परिस्थितियों में सेंसर खतरे का गलत आकलन कर अचानक ब्रेक लगा सकते हैं, जिससे पीछे चल रहे वाहनों के लिए जोखिम पैदा हो सकता है। हालांकि यह हर सिस्टम में होने वाली समस्या नहीं है। इसके लिए भारतीय सड़कों पर तकनीक का परीक्षण और सिस्टम की गुणवत्ता सुनिश्चित करना जरूरी होगा। इसलिए केवल कारों में तकनीक जोड़ना पर्याप्त नहीं है। सड़क की गुणवत्ता, ट्रैफिक प्रबंधन, गति सीमा का पालन और पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा। कितनी महंगी होंगी कारें नए नियमों से कारों की लागत बढ़ने की आशंका है। AEBS के लिए कैमरे, रडार, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट, सॉफ्टवेयर और ब्रेकिंग सिस्टम के साथ एकीकरण पर खर्च करना पड़ सकता है। जिन कारों में जरूरी हार्डवेयर पहले से मौजूद है, उनमें अतिरिक्त लागत सीमित रह सकती है। वहीं बजट कारों में नए उपकरण जोड़ने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है। सेंसर की मरम्मत और दोबारा कैलिब्रेशन का खर्च भी कुछ मामलों में बढ़ सकता है। हालांकि सरकार के प्रस्ताव में कारों की कीमतों में बढ़ोतरी का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि ग्राहकों को कितने रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। वास्तविक असर वाहन निर्माता की तकनीक, उत्पादन लागत और कीमत तय करने की रणनीति पर निर्भर करेगा। ट्रकों पर भी लागू होंगे नए मानक सरकार ने ट्रकों के लिए 1 अक्टूबर 2027 से संशोधित ब्रेकिंग मानकों और इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल यानी ESC को अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। ESC वाहन के अस्थिर होने पर चुनिंदा पहियों पर ब्रेक लगाकर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करता है। तकनीक के साथ सड़क सुधार भी जरूरी सरकार का लक्ष्य 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं और मौतों में 50 प्रतिशत कमी लाना है। AEBS इस दिशा में मददगार हो सकता है, लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए सड़क के ब्लैक स्पॉट सुधारने, स्पष्ट रोड मार्किंग, बेहतर साइनबोर्ड, सुरक्षित पैदल क्रॉसिंग और ट्रैफिक नियमों के प्रभावी पालन की भी जरूरत होगी।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 23, 2026, 12:57 IST
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