इतिहास दोहराता ईरान: भूगोल और ताकत का स्रोत नहीं बदलता, सिर्फ खिलाड़ी बदलते हैं
हम 1875 में हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली की अगुआई में ब्रिटेन ने नहर कंपनी में एक बड़ा हिस्सा खरीद लिया। मिस्र की जमीन पर बनी यह नहर ब्रिटिश नियंत्रण में चली गई है। अंततः ब्रिटेन ने मिस्र को भी अपने नियंत्रण में ले लिया है। स्वेज नहर साम्राज्य का उपकरण बन गई। ब्रिटेन ने इसे अपनी शर्तों पर चलाते हुए आवाजाही रोक दी। 1882 में कांस्टेनोपल में समझौता हुआ। नहर को दोबारा खोला जाता है, पर ब्रिटिश सैन्य अड्डे कायम हैं। होर्मुज का पानी खौल रहा है-सिर्फ जंग की गर्मी से नहीं, इतिहास की गर्मी से भी। क्या ईरान कुछ ऐसा करने की तैयारी में है, जो सत्तर साल पहले अरब के उस पार लाल सागर और भूमध्य सागर के बीच हुआ था आईआरजीसी के कमांडर इतिहास की कौन-सी किताब पढ़ रहे हैं, उसे तलाशने के लिए हम टाइम मशीन में बैठते हैं। अपनी सीट पकड़िए और देखिए कि जहां समुद्र का पानी सबसे संकरा है, वहीं ताकत सबसे चौड़ी है। हम चल रहे हैं सीधे 1850 ईसा पूर्व में। टाइम मशीन उतरी है नील नदी के डेल्टा में। वह उधर खड़े हैं फराओ सेन्यूसरेट (थर्ड)-एक ऐसा शासक, जिसने दक्षिण में नूबिया तक अपना साम्राज्य फैला लिया है। सेन्यूसरेट को पता है भारत और अरब से आने वाला मसाला, रेशम और लोबान रेगिस्तान पार करके भूमध्य सागर तक पहुंचता है। यहां पहले से एक छोटी-सी नहर मौजूद है, जो नील नदी की एक शाखा को बिटरलेक्स से जोड़ती है। सेन्यूसरेट ने आदेश दिया है कि इसे गहरा करो, चौड़ा करो, और व्यापार के लायक बनाओ। पहली बार इतिहास में ऐसा संभव हो रहा है कि जहाज पानी के रास्ते भूमध्य सागर से लाल सागर तक जा सकेंगे। स्वेज नहर का विचार यहीं जन्मा है। टाइम मशीन अब अगले पड़ाव की तरफ बढ़ रही है। बताते चलें कि रेगिस्तान बड़ा निर्मम है। नहर भर जाती है, फिर खोदी जाती है, फिर भर जाती है। 550 ईसा पूर्व अकेमिनेद सुल्तान डारियस द ग्रेट नहर को चौड़ा कर देता है। मगर अफसोस रेगिस्तान की रेत इसे भी निगल जाएगी। अब हम 270 ईसा पूर्व के अलेक्जेंड्रिया में हैं। यह दुनिया का सबसे जीवंत शहर है। यहां टॉलमी (द्वितीय) फिलाडेल्फस का शासन है। टॉलमी ने कहा है कि सेना से ज्यादा मूल्यवान है व्यापार का नियंत्रण। वह नील वाली नहर को फिर से जीवित करते हैं। इंजीनियर उसे साफ एवं चौड़ा करते हैं और एक शुरुआती लॉक सिस्टम भी बनाते हैं। व्यापार फिर से चलने लगता है-मिस्र का अनाज और कागज पश्चिम की ओर, जबकि मसाले और हाथी दांत पूर्व से आते हैं। पर यह सफलता भी स्थायी नहीं रहेगी। रेत का तूफान नहर को फिर खा जाएगा। रोमन इसे दोबारा इस्तेमाल करेंगे। ट्रॉजन 117 ईस्वी में इसे फिर बनवाते हैं। वे इसे ट्राजन की नदी कहते हैं। यह नहर रोम को खाना खिलाती है, लेकिन जब रोम का पतन होता है, तो यह नहर भी खत्म हो जाती है। टाइम मशीन अब 641 ईस्वी में है। मिस्र पर अरबों का कब्जा हो चुका है। यहां अम्र इब्न अल-आस की चर्चा सुनने को मिलेगी। एक चतुर और दूरदर्शी सेनापति ने पुरानी नहर के अवशेष ढूंढकर उसे फिर से खोल दिया है। कारण वही पुराना- मिस्र में अनाज है, अरब को उसकी जरूरत है, और नहर इस दूरी को कम कर देती है। कुछ ही वर्षों में अनाज की नावें फिर चलने लगती हैं। यह नहर खलीज अमीर अल-मुमिनीन कहलाने लगी है। इस बार इसे प्रकृति नहीं, बल्कि राजनीति खत्म करवाती है। अब्बासी खलीफा इसे बंद करवा देता है, ताकि अरब में विद्रोहियों को आपूर्ति न मिल सके। अब टाइम मशीन 1,100 साल लंबा सन्नाटा भरा सफर करते हुए नेपोलियन से मिलने पहुंच रही है। यह 1799 का साल है। सामने खड़े हैं नेपोलियन। वह मिस्र में अपने इंजीनियरों से बात कर रहे हैं। वह इस नहर को बनाना चाहते हैं। मगर उनके इंजीनियर कह रहे हैं कि भूमध्य सागर और लाल सागर के बीच दस मीटर का अंतर है, जिससे नहर बनाना लगभग असंभव है। यह गणना गलत है, पर नेपोलियन इसे मान लेते हैं। सिर्फ एक गणितीय गलती की वजह से इतिहास कुछ वक्त के लिए रुक जाता है। अब शुरू होता है सबसे रोमांचक दौर। टाइम मशीन पोर्ट सईद पर उतर रही है। तारीख है 18 अगस्त, 1869। यहां एक भव्य आयोजन होने जा रहा है। एक चतुर और तेज-तर्रार फ्रेंच डिप्लोमेट, जो यहां सबका नूर-ए-नजर है और जिसने इस इतिहास को गढ़ा है, उसका नाम है फर्डिनेंड डी लेसप। अलेक्जेंड्रिया में अपनी तैनाती के दौरान लेसप ने नेपोलियन के इंजीनियरों की उस पुरानी योजना का गहराई से अध्ययन किया, जिसे एक गलत गणना ने रोक दिया था। उसने मिस्र के वली और ओटोमॉन के वायसराय सईद पाशा को मना लिया है। स्वेज के इस्थमस को काटकर भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ा जाएगा। 1858 में यूनिवर्सल कंपनी ऑफ मैरीटाइम कैनाल ऑफ सुएज बनी। इसमें सिर्फ मिस्र ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया और रूस जैसे देश भी हिस्सेदार हुए। बाद में पता चला कि इन मुल्कों के हिस्सों को मिस्र ने खुद खरीद लिया। दस साल बाद स्वेज नहर तैयार हुई है। भूमध्य सागर और लाल सागर एक-दूसरे से मिले। अब भूगोल की ताकत का युग शुरू हो रहा है। इस वक्त की बड़ी शख्सियतों की मौजूदगी में दुनिया के सबसे कीमती जलमार्ग की शुरुआत हो गई है। अब हम 1875 में हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली की अगुआई में ब्रिटेन ने नहर कंपनी में एक बड़ा हिस्सा खरीद लिया। मिस्र की जमीन पर बनी यह नहर ब्रिटिश नियंत्रण में चली गई है। मिस्र में बगावत हुई, अंततः ब्रिटेन ने मिस्र को भी अपने नियंत्रण में ले लिया है। स्वेज अब केवल एक नहर नहीं, बल्कि साम्राज्य का उपकरण बन गई। ब्रिटेन ने इसे अपनी शर्तों पर चलाते हुए आवाजाही रोक दी। 1882 में कांस्टेनोपल में समझौता हुआ। नहर को दोबारा खोला जाता है, और इसे अंतरराष्ट्रीय मार्ग के रूप में मान्यता मिली है, मगर स्वेज पर ब्रिटेन सैन्य अड्डे कायम हैं। अब टाइम मशीन 1950 के दशक में है। मिस्र में ब्रिटिश सैन्य मौजूदगी के खिलाफ आवाज उठने लगी है। जनवरी 1952 में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। फिर जुलाई 1952, एक और निर्णायक मोड़ आया। मिस्र के सुल्तान किंग फारुक के खिलाफ बगावत। रिवोल्यूशनरी कमांड काउंसिल सत्ता पर काबिज। अब हम उस इतिहास के सामने हैं, जिसे आज का तेहरान पढ़ रहा है। 1956, काहिरा। मंच पर खड़े हैं गमाल अब्दुल नासिर। भाषण के बीच वह एक नाम लेते हैं-डी लेसप। जैसे ही यह नाम बोला जाता है, मिस्र की सेना नहर पर कब्जा कर लेती है। स्वेज बंद। यूरोप, अमेरिका को तेल की आपूर्ति ठप। स्वेज संकट की शुरुआत हो गई है। अब आप टाइम मशीन में बैठकर दूर से इसे देखिए। ब्रिटेन, फ्रांस और इस्राराइल ने मिस्र पर हमला कर दिया है, लेकिन कहानी में मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर ने ब्रिटेन-फ्रांस के ऑपरेशन मस्कीटियर्स को रोक दिया है। अमेरिका में तेल संकट का खतरा जो है। बाजारों में कोहराम। ब्रिटिश पाउंड ध्वस्त। आईएमएफ भी ब्रिटेन की सहायता को नहीं आया। यह सात नवंबर 1956 है। स्वेज नहर खुल गई है। संयुक्त राष्ट्र का शांति समझौता लागू हो रहा है। नासिर युद्ध के मैदान में हारते हैं, लेकिन इतिहास में जीत जाते हैं। वह साबित कर देते हैं कि अगर आपके पास एक संकरा समुद्री रास्ता यानी चोकप्वाइंट है, तो थोड़े समय का दबाव झेल कर बड़ी ताकतों को भी झुकाया जा सकता है। टाइम मशीन वापस ईरान की तरफ उड़ चली है। इतिहास हमें एक सीधी बात बताता है-भूगोल नहीं बदलता। ताकत का स्रोत भी नहीं बदलता। सिर्फ खिलाड़ी बदलते हैं। सेन्यूसरेट से लेकर टॉलेमी, अम्र इब्न अल-आस से लेकर नासिर तक। अगर आप उस जगह को नियंत्रित करते हैं, जहां से दुनिया को गुजरना ही पड़े, तो आप खेल के नए नियम लिख सकते हैं। और शायद आज, तेहरान भी यही सोच रहा है। हम होर्मुज के बीच लराक द्वीप पर उतरेंगे, जहां ईरान ने होर्मुज से गुजरने वालों के लिए टोल लगा दिया है। फिर मिलते हैं अगले सफर पर
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 12, 2026, 06:20 IST
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