कभी हां, कभी ना: होर्मुज, लेबनान और इस्राइल के बीच उलझा अमेरिका-ईरान का शांति समझौता

वर्साय के महल से जुड़ी इतिहास की बातें पूरी दुनिया में अजीब तरह से गूंजती हैं। सोने की परत और 350 से ज्यादा शीशों से सजे इस हॉल में 1919 में शांति के लिए वर्साय की संधि पर दस्तखत किए गए थे। इस संधि ने गुस्से का माहौल बनाया और बीस साल बाद 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध की नींव रखी। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर दस्तखत के लिए इसी जगह को चुना। हो सकता है कि अमेरिकी विदेश विभाग के लोगों ने संकोच किया हो, लेकिन वह आगे बढ़ गए! जैसा कि उम्मीद थी, शांति समझौते की शुरुआत ही उसके अंत जैसी लग रही थी। चौदह सूत्री समझौता ज्ञापन की पहली शर्त में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत और हमेशा के लिए खत्म करने की बात कही गई थी। इसके बाद जो हुआ, उसमें सबसे पहले इसी शर्त का उल्लंघन हुआ। कुछ ही घंटों में शांति का वादा टूट गया, क्योंकि इस्राइल ने लेबनान में कई जगहों पर 12 हवाई हमले किए। जैसा कि आशंका थी, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। शांति का वादा रेगिस्तान की मरीचिका जैसा ही एक भ्रम है, जो कभी दिखती है, तो कभी गायब हो जाती है। लेबनान में हमले जारी रहे, जबकि इस्राइल और हिज्बुल्लाह ने युद्धविराम पर सहमत होने का दावा किया था। शांति समझौते को गठबंधन के भीतर से ही खतरा है। अमेरिका की एक खुफिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस्राइल शांति समझौते को कमजोर कर सकता है। वैसे शांति समझौता न तो पूरी तरह खत्म हुआ है और न ही पूरी तरह जीवित है। रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस जिनेवा पहुंचे। वहां बातचीत के दौरान ही ट्रंप ने एक और फरमान जारी किया, जिसमें कहा गया कि अगर ईरान ने लेबनान में हिज्बुल्लाह को नहीं रोका, तो अमेरिका ईरान पर कड़ा प्रहार करेगा। इसके बाद स्थिति शांत हुई और बातचीत आगे बढ़ी। मध्यस्थों (पाकिस्तान और कतर) की ओर से सोमवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि दोनों पक्ष भविष्य की घटनाओं से बचने के लिए बातचीत का एक जरिया बनाने और भविष्य की बातचीत के लिए एक रोडमैप तैयार करने पर सहमत हुए हैं। भू-राजनीति असल में कूटनीति के लिबास में छिपी घरेलू राजनीति ही है। ईरान, इस्राइल और अमेरिका, तीनों ही जगहों पर इस शांति समझौते को नापसंद किया जा रहा है। नफरत और गुस्से का इजहार लगातार जारी है। इस्राइली मंत्रियों ने भड़काऊ बयान दिए, तो वेंस ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई। शांति समझौते का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, आप 90 लाख लोगों का देश हैं। आप राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हर समस्या को सिर्फ लोगों को मारकर हल नहीं कर सकते। अलग-अलग नजरियों की वजह से शांति की स्थिति और भी नाजुक हो गई है। ईरान को लगता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण करके उसे एक ऐसा हथियार मिल गया है, जिससे वह दूसरों को रोक सकता है। वहीं अमेरिका, जो सबसे बड़ी सैन्य शक्ति और अर्थव्यवस्था है, इससे सहमत नहीं है कि उसे किसी मुश्किल स्थिति में फंसा दिया गया है। यह समझौता राजनीतिक इच्छाशक्ति के बजाय आर्थिक मजबूरियों पर टिका है। वास्तविकता यह है कि इस समझौते के ढांचे में कुछ कमियां हैं। मसलन, लेबनान के मामले में दो पक्षों ने इस पर हस्ताक्षर किए, लेकिन तीसरे पक्ष (जो लेबनान पर बमबारी कर रहा है) ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं! नेतन्याहू ने कहा कि इस्राइल की सेनाएं लेबनान में जब तक जरूरी होगा, बनी रहेंगी। यह समझौता उन पर बाध्यकारी नहीं है। ऐसे में कहना मुश्किल है कि क्या ट्रंप नेतन्याहू को अपनी बात मानने के लिए राजी कर पाएंगे। होर्मुज मार्ग को खोलने को लेकर उलझन बनी हुई है। बारूदी सुरंगों को हटाने और बीमा कंपनियों से मंजूरी मिलने के इंतजार में 250 टैंकर और 300 से अधिक जहाज खड़े हैं। समझौते के मुताबिक, ईरान 60 दिनों तक जहाजों को बिना किसी शुल्क के गुजरने देगा। हालांकि, ईरान का कहना है कि 60 दिनों के बाद शुल्क लिया जाएगा, पर समझौते में इस बारे में कोई जिक्र नहीं है। समझौते के अनुसार, ईरान इस मार्ग के भविष्य को तय करने के लिए ओमान और अन्य देशों से बात करेगा। ईरान ने पहले ही शुल्क-आधारित आवाजाही के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है। उसने इस मार्ग से गुजरने वाले सभी जहाजों के लिए अनिवार्य बीमा लागू कर दिया है। कई विवादित मुद्दों को देखते हुए 60 दिन की समय-सीमा काफी महत्वाकांक्षी है। ओबामा के समय हुए संयुक्त व्यापक कार्य योजना समझौते में ही 20 महीने से ज्यादा का समय लगा था। परमाणु मुद्दे के लिए विशेषज्ञता और समय की जरूरत होती है-जैसे यूरेनियम कौन निकालेगा, डी-ब्लेंडिंग की प्रक्रिया क्या होगी, और इसकी निगरानी कौन करेगा दुनियाभर में ईरान की लगभग 100 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त है। इसकी प्रक्रिया क्या होगी इसका क्रम क्या होगा, क्या पहले प्रतिबंध हटाए जाएंगे क्या कोई शर्तें होंगी समझौते में कहा गया है कि अमेरिका और क्षेत्रीय सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण के लिए फंड तैयार करेंगे, पर यह नहीं बताया गया है कि इसका खर्च कौन उठाएगा। इस बात से रिपब्लिकन नाराज हो गए और इस अस्पष्टता ने खाड़ी देशों में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि हो सकता है कि खर्च का बोझ उन्हीं पर पड़े। लोगों के गुस्से के कारण ट्रंप और वेंस को बार-बार यह कहना पड़ा कि अमेरिका इसके लिए पैसे नहीं दे रहा है। हालांकि, उनकी बात पर अभी तक लोगों ने भरोसा नहीं किया है। वेंस ने रिपब्लिकनों के गुस्से के लिए ईरान के प्रोपेगैंडा को जिम्मेदार ठहराया है! एक आम शिकायत यह है कि ईरान ने युद्ध और समझौता, दोनों में ही अमेरिका को मात दी है। अच्छी खबर यह है कि कीमतें कम हुई हैं और बाजार ने शांति को मान लिया है। हालांकि, शांति का बने रहना काफी हद तक समझदारी के टिके रहने और उसे बनाए रखने पर निर्भर करता है। नेपोलियन को लगता था कि वह रूस को जीत रहा है। ट्रंप को लगा कि वह ईरान में भी वेनेजुएला जैसा कुछ कर सकते हैं। जो नेता यह मानते हैं कि वे घटनाओं की दिशा तय कर रहे हैं, असल में वे खुद उन घटनाओं के गुलाम होते हैं। वे ऐसी ताकतों के बहाव में बह जाते हैं, जो उनके अहंकार को भी निगल जाती हैं। लियो टॉल्स्टॉय ने वॉर एंड पीस में लिखा है, राजा इतिहास के गुलाम होते हैं। edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 24, 2026, 02:31 IST
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