मुद्दा: कचरा प्रबंधन और एक अनुत्तरित सवाल

देश में कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से आगामी एक अप्रैल से लागू होने वाले ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 की अधिसूचना जारी कर दी गई है। पिछले दस साल के अंतराल के बाद, लगभग एक साल तक जनता की राय, आपत्तियों और गहन चर्चा के बाद इन नए नियमों को अंतिम रूप दिया गया है। वर्तमान सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान पर खास जोर दिया है। सरकार की इस मंशा पर रत्ती भर भी शक नहीं किया जा सकता है, लेकिन अब भी सबसे अहम यक्ष प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि नए नियमों को प्रभावी रूप से लागू किया जा सकेगा अथवा नहीं कचरा प्रबंधन की शुरुआत 1994 में उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति से हुई। इसके बाद पिछले तीन दशकों से अधिक समय में नियमों को अलग-अलग बदलावों के साथ तीन बार लागू किया गया, किंतु वास्तविकता यह है कि इन नियमों का पालन बहुत धीमा रहा और वे अब भी काफी हद तक कागजों तक ही सीमित हैं। सर्वप्रथम, नगरीय अपशिष्ट (प्रबंधन एवं संचालन) नियम, 2000 लागू किए गए। फिर, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 लागू हुए। हाल ही में, इनके संशोधित और विस्तारित रूप 2026 को लागू किया गया है, ताकि कचरा प्रबंधन बेहतर ढंग से हो सके, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिले और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके। जहां पूर्व के दोनों नियम मात्र शहरी सीमाओं तक सीमित थे, वहीं नया रूप भारत के समस्त भूस्वामियों एवं उपयोगकर्ताओं पर लागू होता है। उसी क्रम में पूर्ववर्ती नियमों के तहत कचरा प्रबंधन का संपूर्ण दायित्व स्थानीय निकायों तक ही सीमित था, पर नए नियमों के तहत कचरा उत्पन्न करने वाले नागरिकों, बाजारों, उद्यमों आदि को भी उक्त प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बनाया गया है। कचरा प्रबंधन के विज्ञान में मुख्य अपेक्षा यह होती है कि यह पर्यावरण के अनुकूल हो और चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों के अनुसार काम करे। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पहली आवश्यकता कचरा उत्पादन के स्तर से ही इन्हें अलग-अलग इकट्ठा करना एवं कचरे को एक बार ही हस्तालन (हैंडलिंग) करने की है। प्रवर्तित नियमों में इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए एक मुख्य और सामान्य प्रावधान यह है कि कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग-अलग किया जाए। वर्ष 2000 के नियमों में कचरा गीला और सूखा, 2016 के नियमों में सूखा, गीला एवं घरेलू घातक, तथा नए नियमों में सूखा, गीला, सेनेटरी, तथा विशेष देखभाल वाले, चार भागों में विभाजित करने का प्रावधान किया गया है। हर बार नियमों में बदलाव के साथ कचरे को अलग-अलग भागों में बांटने की श्रेणियां बढ़ती गईं, पर 2000 के नियमों की मूल भावना के अनुसार, गोवा को छोड़कर पूरे देश में, कुछ गिने-चुने शहरों को छोड़ दें तो, कचरा स्रोत स्तर पर गीला व सूखा जैसे दो हिस्सों में भी अलग होकर नहीं आ रहा है। अलग-अलग करकेे ही कचरे का सदुपयोग किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि हर स्तर पर उत्पन्न कचरे को विभिन्न उद्योगों व उत्पादन के अनुरूप कच्चे माल के रूप में चिह्नित किया जाए। दुर्भाग्यवश, कुछ अपवादों के अतिरिक्त वर्तमान व्यवस्था किसी भी रूप में स्रोत से अलग-अलग कचरा एकत्रित करने हेतु सक्षम नहीं है। देश में आम तौर पर कचरा इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले साधन बाहर से दो रंगों में विभाजित दिखाई देते हैं, मानो कचरा अलग-अलग रखा जा रहा हो, पर सच यह है कि इंजीनियरिंग, आर्थिक व प्रबंधन के दृष्टिकोण से एक ही संग्रहण वाहन में कचरे को कम से कम दो हिस्सों में रखना लगभग असंभव है। यह पर्यावरण सम्मत भी नहीं होगा। इन्हीं संदेहों के मध्य सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण होगा विशेष देखभाल वाले चतुर्थ भाग में वर्णित अपशिष्ट को इकट्ठा कर उसका निस्तारण करना। इसमें एक्सपायर्ड दवाओं, बैटरी, ट्यूबलाइट, थर्मामीटर, समेत कई प्रकार के अपशिष्ट पदार्थों को एकत्रित करने की अभिशंषा की गई है। इनके भौतिक व रासायनिक स्वरूपों में अंतर होने के कारण संग्रहित होने के बाद इन्हें पुनः विभाजित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहेगा। उचित होता कि दवाओं, धातु की वस्तुओं, बैटरी इत्यादि के बेहतर निष्पादन प्रबंधन हेतु उनके मूल विक्रय स्थान पर पुनर्खरीद व्यवस्था को ठोस रूप में लागू किया जाता। इसी प्रकार, वर्तमान नियमों में खुले छोड़े गए कई प्रावधानों की अवहेलना होने की भी पूर्ण आशंका बनी रहेगी। अच्छी भावना के साथ लागू किए जाने वाले नियमों में अभियोजन की कठोरता का अभाव इन्हें बहुत हद तक अप्रभावी बना देता है। बेहतर कचरा प्रबंधन के लिए अभियोजन अधिकारों को स्थानीय निकायों तक सीमित न रखते हुए व्यापक रूप से विभिन्न विभागों एवं संस्थानों को अधिकृत किया जाना श्रेयस्कर होता। इन सब के बावजूद, सरकार की कचरा प्रबंधन के प्रति सदिच्छा के चलते उक्त नियम न सिर्फ भविष्य के लिए बेहतर आधारशिला रखेंगे, अपितु बेहतर पर्यावरण में सहायक होंगे, यही अपेक्षा की जानी चाहिए।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 25, 2026, 04:06 IST
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