कमलेश राजहंस: मुसीबत लाख आ जाये न अपना सब्र खोता है
मुसीबत लाख आ जाये न अपना सब्र खोता है गमों की आंच को आंखों के पानी से भिगोता है जो बन कर मसखरा सारे ज़माने को हंसाता है वो बाहर से हंसाता है मगर भीतर से रोता है तू नफरत की निगाहों से न देखो झोपड़ी उसकी झुके कंधों पे जो इस देश का भूगोल ढोता है दिली औलाद खाकर गोलियां सरहद पे सोती है पसीना ओढ़ कर वो खेत की मेड़ों पे सोता है जिसे जज्बात की लहरों के संग बहना नहीं आया वो माझी सल्तनत की नाव साहिल पर डुबोता है हो रूहें कैद पर रोटी लंगोटी मुफ्त मिलती हो वहां जनतंत्र का हर आदमी पिंजरे का तोता है जिन्हें इस देश की आबो हवा अच्छी नहीं लगती उन्हें नेता जी कहने में बड़ा अफसोस होता है हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 28, 2026, 19:10 IST
कमलेश राजहंस: मुसीबत लाख आ जाये न अपना सब्र खोता है #Kavya #UrduAdab #KamleshRajhans #HindiShayari #UrduGhazals #SubahSamachar
