Leprosy Eradication Day: इंग्लैंड से आई कुष्ठ रोगियों की मददगार भारतीय मूल की महिला, जीवन की जंग में बनी मसीहा

दक्षिण अफ्रीका में जन्मी और इंग्लैंड में पढ़ी भारतीय मूल की संगीता ढाल कुष्ठ रोगियों की मसीहा और मददगार बनकर काम कर रही हैं।समाज जहां कुष्ठ रोगियों को हीनता की भावना से देखता है, लोग उनके पास जाना तो दूर उन्हें छूने से भी डरते हैं संगीता उनके साथ अपनापन महसूस करती हैं। वह उनके साथ बैठती हैं। रोगियों की पट्टी करती हैं। उनसे बातचीत करती हैं। उनके साथ घुल-मिल जाती हैं और बहुत ही प्यार से उनका उपचार करती हैं। कुष्ठ रोगियों को सम्मान के साथ जिंदगी जीना सिखाती हैं। वह यह काम 2017 से करती आ रही हैं। वह एक निजी संस्था के साथ जुड़कर यह काम कर रही हैं। संगीता ढाल बताती हैं कि समाज में सभी लोग समान हैं। सभी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार हैं। कोई छोटा और कोई बड़ा नहीं है। हम सभी इंसान हैं और सभी एक समान हैं। संगीता बहुत ही अच्छी हिंदी बोलती हैं। उनके दादा-परदादा मूल रूप से पंजाब के रहने वाले हैं। उन्होंने हिंदी बोलना अपनी मां से सीखा है। पूर्वी दिल्ली के ताहिरपुर गांव में कुष्ठ रोगियों की एक पूरी कॉलोनी बसी हुई है। यहां बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल है। केयर सेंटर है, लेकिन सुविधाएं नहीं है। यहां पहुंचने पर हमें पता चला कि आसपास के लोग इस अलग-सी दुनिया को कोढ़ी कॉलोनी या लैप्रोसी कॉलोनी के नाम से पुकारते हैं। यह कॉलोनी गूगल मैप पर खोजने से नहीं मिलती है, लेकिन यहां अलग-अलग राज्यों से आकर एक मिनी इंडिया बसा हुआ है। कॉलोनी के अंदर प्रवेश द्वार पर बड़े से अक्षर में अंग्रेजी शब्दों में वेलकम टू विलेज ऑफ होप लिखा हुआ दिखाई देता है। यहां वे लोग रह रहे हैं, जिसे समाज और अपने परिवार ने दुत्कार दिया। उनकी इस कुदरती बीमारी को समाज ने भगवान का श्राप बता दिया और बेदखल कर दिया। यहां के लोग इस कॉलोनी में आम लोगों की तरह ही अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं। नौकरी न मिलने पर मजबूरन भीख मांग कर करते हैंगुजारा कॉलोनी के निवासी बताते हैं कि जब वह गांव से बाहर नौकरी करने के लिए जाते हैं, तो लोग उन्हें काम पर नहीं रखते हैं। उन्हें समाज अछूत की नजर से देखते हैं। उनके साथ भेदभाव करते हैं। ऐसे में वे मजबूरन भीख मांगकर अपना गुजारा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे भी आम लोगों की तरह मेहनत करते हैं। वे नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन यह समाज उन्हें रोजगार पर नहीं रखता। सरकारी सुविधा भी न के बराबर यहां के निवासी बताते हैं कि उन्हें सरकारी मदद न के बराबर मिलती है। सरकारी अस्पतालों में जब वे अपना उपचार कराने के लिए जाते हैं, तो वह खुद को नीचा महसूस करते हैं। इस समाज पर खुद को बोझ समझने लगते हैं। वे घंटों लाइन में लगकर उपचार कराने का इंतजार करते हैं। इसके बावजूद उन्हें सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं मिलती हैं। आरोप है कि अस्पतालों में सिर्फ पट्टी कर उनकी छुट्टी कर दी जाती है। वह लोग किसी तरह से भीख मांगकर या कुछ काम-काज कर छोटे निजी अस्पतालों में अपना उपचार कराते हैं। ऐसे में उनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। जो कुछ भी रुपये वे कमाते हैं। वह सारा रुपये उनके इलाज में खर्च हो जाता है। उन्होंनेे आरोप लगाया कि चुनाव के समय उनकी कॉलोनी में बहुत सारी गाड़ियां आती हैं। उनके जनप्रतिनिधि उन्हें बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म हो जाने के बाद कोई भी नेता उनकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखते हैं। एनजीओ के सहारे पहुंच रही है मदद लोगों ने बताया कि जब उन्हें सरकारी मदद नहीं मिल पाती हैं। तब गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) उन तक मदद पहुंचाते हैं। इन्ही समाज सेवी संस्था से उन्हें कुछ हद तक राहत पहुंच पाती है। यह संस्था उन तक दवाइयां और राशन पहुंचाने का काम करती हैं। साथ ही, उनके कॉलोनी में बच्चों को पढ़ाने का भी काम करते हैं। मैं मूल रूप से नेपाल की रहने वाली हूं। जब मैं 6 साल की थी, तो मुझे कोढ़ हो गया। मेरे परिवार वाले भी मुझसे दूर भागने लगे। उन्होंने मेरा उपचार करने की जगह मुझे दिल्ली छोड़ गए। अपना हो के भी मेरे साथ पराया जैसा व्यवहार किया। यहां कुष्ठ रोगी कॉलोनी में करीब 35 साल से अधिक हो गए। - इसरा लोग हमारे साथ अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं। कोढ़ को भगवान का श्राप बताते हैं। जब मुझे कोढ़ हुआ, तो खुद अपने परिवार के लोगों ने मेरे साथ जानवर जैसा व्यवहार किया। परिवार के लोगों ने मुझे जामताड़ा, झारखंड से दिल्ली छोड़ गए। कई साल तक उपचार कराया, लेकिन यह ठीक नहीं हुआ। -दुलारी देवी मैं बिल्कुल सही सलामत हूं। मेरे पति को बचपन से कोढ़ है। उनके साथ मेरी शादी गरीबी की वजह से हुई। शादी के बाद परिवार वालों ने हमें अलग कर दिया। बाद में, हम उड़ीसा से दिल्ली आ गए। यहां मैंने अपने पति का इलाज कराया, लेकिन वह ठीक नहीं हुए। अभी भी उनका उपचार चल रहा है। -सचला साहू जब कोढ़ हुआ, तो परिवार ने घर से निकाल दिया। कई जगह उपचार कराया, लेकिन ठीक नहीं हुआ। किसी ने नौकरी पर नहीं रखा। अब मजूबरन भीख मांग कर अपना गुजारा कर रहा हूं। सरकारी अस्पतालों में जाता हूं, तो पट्टी करके भगा देते हैं। दवाइयां नहीं देते हैं। निजी डिस्पेंसरी से दवा खरीदना पड़ता है। -मोहम्मद हदीस

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 30, 2026, 03:46 IST
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