महाशिवरात्रि: गले सर्पों के हार, सिर गंगा की धार ले भोला आए ब्याह रचाने...; महंत आवास पर निभाई गई परंपरा
Mahashivratri : गले में सर्पों का हार, सिर पर गंगा की धार ले भोला आए बियाह रचाने, छोड़ी मृगछाला, चंद्रमा जटा सजाया, सजे बराती संग भोला चले गौरी लाने को। इस धुन से काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत का आवास गुंजायमान हो उठा। महाशिवरात्रि पर यहां बाबा विश्वनाथ के विवाह का लोकाचार हुआ। राजसी शृंगार में सजे बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की झांकी देखते ही बन रही थी। बुधवार को महाशिवरात्रि पर बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ और माता गौरा का वर-वधू के रूप में राजसी शृंगार हुआ। दूल्हा बने बाबा की प्रतिमा को सेहरा लगाया गया। माता गौरा मथुरा से मंगवाई गई खास लाल लहंगे में सजीं। टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत के आवास पर 350 साल से भी अधिक समय से चली आ रही लोकपरंपरा के अनुसार पं. वाचस्पति तिवारी ने दोपहर में मातृका पूजन की परंपरा का निर्वाह किया। पारंपरिक वैवाहिक गीतों की गूंज होती रही।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 26, 2025, 22:08 IST
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