Manipur: ' दशकों पहले की गई मणिपुर की जनसांख्यिकीय बदलाव की शुरुआत', पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का दावा
मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि राज्य के जनसांख्यिकीय परिवर्तन को दशकों पहले व्यवस्थित तरीके से किया गया। 1960 के दशक से हजारों शरणार्थी राज्य में अधिकारियों की जानकारी में बसे और उन्हें पुनर्वास के लिए सहायता प्रदान की गई। उल्लेखनीय है कि बीरेन सिंह ने फरवरी में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि उन परिवारों का क्या हुआ और क्या उन लोगों को चुनावी सूची में शामिल किया गया था। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि यह तब हुआ, जब मणिपुर के भाजपा विधायक ने 2001 की जनगणना की समीक्षा और राज्य में सीमा निर्धारण (डेलिमिटेशन) प्रक्रिया शुरू करने से पहले एनआरसी के कार्यान्वयन की मांग की थी। सिंह ने कहा, आधिकारिक रिकॉर्ड दिखाते हैं कि हम एक पूर्ण राज्य बनने से पहले ही हजारों शरणार्थियों को अधिकारियों की जानकारी में यहां बसाया गया था। 1960 के दशक के अंत और 70 के दशक की शुरुआत में, दस्तावेजों से पता चलता है कि 1,500 से अधिक परिवार यहां बस गए थे और उन्हें पुनर्वास के लिए सहायता प्रदान की गई थी। उल्लेखनीय है कि मणिपुर 1 नवंबर, 1956 को एक केंद्र शासित प्रदेश बना था और 21 जनवरी, 1972 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। सिंह ने पूछा, उन परिवारों का क्या हुआ। उन्हें किस तरह से एकीकृत किया गया। तब से कितनी पीढ़ियां बढ़ी हैं। क्या उन्हें अंततः पूर्ण अधिकार दिए गए। क्या उन्हें चुनावी सूची में शामिल किया गया। इन सवालों का कभी पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से उत्तर नहीं दिया गया और यह मुद्दा ज्यादातर अनकहा ही रहा, जबकि राज्य की जनसंख्यात्मक संरचना समय के साथ बदलती रही। सिंह ने कहा कि उस समय मणिपुर से सांसद पाओकाई हौकिंप ने एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने गृह मंत्री राज्य मंत्री केसी पंत को सूचित किया था कि 1967 तक 1,500 से अधिक शरणार्थी परिवार मणिपुर में बस गए थे। सिंह ने इस पत्र की एक प्रति साझा की। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, यह पत्राचार इस मुद्दे की जड़ें और लंबी अवधि को प्रमाणित करने वाले कई पत्रों में से एक है। सिंह ने यह भी सवाल किया कि क्या मणिपुर शरणार्थियों के लिए एक डंपिंग ग्राउंड था शुरू से ही थी, और यह सवाल उठाया कि क्या इन व्यक्तियों को शरणार्थी स्थिति में बनाए रखने के लिए कानूनी व्यवस्था मौजूद थी। क्या उन्हें स्वदेशी समुदायों के लिए निर्धारित लाभ दिए गए थे। ये छोटे मुद्दे नहीं हैं, ये हमारे पहचान, सामाजिक संतुलन और समाज के रूप में हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उससे जुड़े हुए हैं। सिंह ने कहा कि अब इस अध्याय को फिर से देखने की जरूरत है, न कि दोषारोपण करने के लिए, बल्कि यह समझने के लिए कि क्या हुआ था।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 03, 2025, 05:52 IST
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