पड़ोस: किस करवट बैठेगा नेपाल, भू-राजनीतिक संतुलन पर एक जनमत संग्रह होगा आगामी चुनाव
आगामी पांच मार्च को नेपाल में चुनाव होने वाले हैं, पर राष्ट्र अब भी विगत सितंबर में बड़े पैमाने पर हुए विरोध-प्रदर्शनों की उथल-पुथल से उबर रहा है। इन प्रदर्शनों को आम तौर पर पांचवीं क्रांति कहा जाता है, जिसके कारण केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (सीपीएन-यूएमएल) की सरकार गिर गई थी। नए चुनावों की घोषणा से पहले हफ्तों तक अशांति, प्रशासनिक पंगुता और राजनीतिक अनिश्चितता रही। हालांकि, मतदान पूरे देश में होना है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए संदेह है कि मतदान आसानी से हो पाएगा या नहीं। यह चुनाव एक आम लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ज्यादा विश्वसनीयता, सांविधानिक स्थिरता, युवाओं के आक्रोश और नेपाल के अपने दो शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच भू-राजनीतिक संतुलन पर एक जनमत-संग्रह है। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच है। नेपाली कांग्रेस के लिए प्रचार मुख्यतः लोकतंत्र की बहाली और संस्थाओं में भरोसा फिर से बनाने पर केंद्रित है। पार्टी नीतिगत पूर्वानुमान, छोटे और मझोले उद्यमों को फिर से शुरू करने, भारत के साथ हाइड्रोपावर सहयोग बढ़ाने और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का वादा कर रही है, खासकर विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट शटडाउन और पुलिसिंग विवादों को देखते हुए। हालांकि, पार्टी की आंतरिक गुटबाजी उसका एक संरचनात्मक कमजोर पक्ष बना हुआ है, जो उसके चुनावी लाभ को कम कर सकता है। वहीं, कम्युनिस्ट विचारधारा एक अलग सोच पेश करती है। सीपीएन-यूएमएल अपने उथल-पुथल भरे और अस्त-व्यस्त कार्यकाल को बचाने के लिए मजबूत नेतृत्व, बुनियादी ढांचों में बढ़ोतरी और राष्ट्रवादी दावे करके हर मुमकिन कोशिश कर रही है। पुष्प कमल दहल के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केंद्र) सामाजिक न्याय, संघीय सशक्तीकरण और युवाओं की आकांक्षाओं के अनुरूप सांविधानिक सुधारों पर जोर देकर अपनी पुनर्वितरणवादी विश्वसनीयता को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है। साथ मिलकर वामपंथी दल संप्रभुता, संतुलित कूटनीति और पारंपरिक निर्भरता से आगे आर्थिक विविधीकरण पर जोर देते हैं। फिर भी, व्यापक वामपंथी धड़े के भीतर वैचारिक एकता नाजुक बनी हुई है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाएं एकता को जटिल बनाती हैं। चुनावी अभियान को और जटिल बनाता है घोषणा-पत्र प्रकाशन को लेकर विवाद। चुनाव लड़ रहे 68 दलों में से आधे से अधिक निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपने घोषणा-पत्र प्रकाशित करने में विफल रहे। चुनाव मैदान में 3,406 उम्मीदवार हैं, जिनमें लगभग 1,160 निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं, जो 165 सीटों के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। वित्तीय अनुपालन भी असमान रहा है। ये चूकें उस समय संस्थागत अनुशासन पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं, जब सार्वजनिक विश्वास पहले ही कमजोर हो चुका है। साथ ही, पिछले चुनाव के खंडित जनादेश की यादें बनी हुई हैं और मतदाता अनिश्चित नतीजे को लेकर सावधान हैं। भारत के लिए, नेपाल की स्थिरता का सीधा असर सुरक्षा और आर्थिक तौर पर होता है। दोनों देशों के बीच 1,700 किलोमीटर से अधिक की खुली सीमा, गहरे ऐतिहासिक रिश्ते और करीबी सैन्य सहयोग है। हाल के वर्षों में हाइड्रोपावर सहयोग, सीमा पार बिजली व्यापार और संपर्क परियोजनाओं ने रफ्तार पकड़ी है। इसे बनाए रखने के लिए काठमांडो में एक भरोसेमंद और स्थिर सरकार जरूरी है। इसके अलावा, नेपाल में राजनीतिक संकट के दौरान अक्सर घरेलू लामबंदी के औजार के तौर पर समय-समय पर भारत विरोधी बातें उठती रही हैं। नई दिल्ली की प्राथमिकता एक संप्रभु, लेकिन स्थिर नेपाल है, जिसके साथ पारंपरिक रिश्ते मजबूत किए जा सकें। पिछले दशक में नेपाल में चीन की भागीदारी काफी बढ़ी है। नेपाल के लिए, भारत और चीन के साथ संतुलन बनाना अब भी मुश्किल है। भूगोल काठमांडो को नई दिल्ली व बीजिंग, दोनों के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है। ऐसे में, चुनाव के नतीजे यदि एक तरफ झुकते हैं, तो यह संतुलन बिगड़ने का खतरा है। नेपाल में चुनाव युवाओं की नाराजगी, संस्थाओं की कमजोरी और भू-राजनीतिक संवेदनशीलता की पृष्ठभूमि में हो रहे हैं। भारत और चीन, दोनों के लिए ही, इस नतीजे का रणनीतिक महत्व है। फिर भी, निर्णायक आवाज नेपाल के मतदाताओं की होगी-चाहे वे पुराने राजनीतिक ढांचे को फिर से बनाना चाहें या गणतंत्र की दिशा को फिर से तय करने की कोशिश करें। यह नेपाल की लोकतांत्रिक व सांस्थानिक मजबूती और भू-राजनीतिक संतुलन को आकार देगा। edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 24, 2026, 05:34 IST
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