अब डाकियों के थैले में रिश्तों के पत्र नहीं, सरकारी कागज ज्यादा
संवाद न्यूज एजेंसी बहादुरगढ़। एक दौर था जब चिट्ठी आई हैसुनते ही पढ़ने ही उत्साह बढ़ जाता था और पढ़ने होड़ लग जाती थी। डाकिये के साइकिल की घंटी किसी अपने के संदेश का अहसास कराती थी लेकिन मोबाइल और इंटरनेट के युग में पाती का लगभग इतिहास बन चुकी है। अब डाकिये के थैले में रिश्तों की खुशबू लिए पत्र नहीं बल्कि अधिकतर सरकारी दस्तावेज, बैंक संबंधी कागज और आधिकारिक डाक ही नजर आती है। बदलती तकनीक के साथ डाक विभाग की भूमिका भी भावनाओं के संदेशवाहक से जनसेवा के भरोसेमंद माध्यम तक सिमटकर बदल गई है। आधुनिक तकनीक के साथ चिट्ठी के मायने भी बदल गए हैं। अब डाकिया घरों में पहुंचता है तो केवल सरकारी दस्तावेज लेकर। बहादुरगढ़ डाकघर में 16 डाकिये हैं। जो प्रतिदिन शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंचकर लोगों के डाक घरों तक पहुंचाने का काम करते हैं। कभी राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस पर डाकियों की खासी पूछ हुआ करती थी। इस मौके पर मिठाई बंटती थी। जान पहचान वाले भी बधाई दिया करते थे। जाने दो भैया, उन दिनों की याद मत दिलाओ। 016 वर्षों से डाक बांटता हूं। शुरुआती दिनों में डाक बांटने के कुछ समय बाद ही लोग उन्हें शक्ल से ही पहचान लिया करते थे। जिस भी घर के सामने से निकला करते थे, लोग टकटकी लगाकर देखते थे लेकिन आज परिस्थितियां विपरीत हैं। लोग खतों का नहीं बल्कि सरकारी पार्सलों का इंतजार करते हैं। व्हाट्सएप और फेसबुक के इस दौर ने पुरानी पीढ़ी से एक कीमती चीज छीन ली है।-बलवान सिंह, कर्मचारी 0पत्र भेजने का यह सिलसिला 11 वर्ष पहले तक रहा है। वह पिछले काफी समय से यहां तैनात हैं। वह दौर काफी अलग था और यह दौर बेहद अलग है। अब खत के बारे में कोई नहीं पूछता, पहले उनसे लोग खत आने के बारे में पूछा करते थे। 11 वर्ष पहले लोगों के घरों तक चिट्ठियां पहुंचाई है।-जोगेंद्र सिंह, कर्मचारी 0आधुनिक युग चल रहा है। इस युग में चिट्ठी के मायने बदल गए हैं। न तो विभाग में किसी की चिट्ठी आती है और न ही कोई दूसरे स्थानों पर भेजने के लिए आता है। व्हाट्सएप और सोशल मीडिया ने सब कुछ बदलकर रख दिया है। -संजीव बधवार, पोस्टमास्टर -फोटो 86 : संजीव बधवार -फोटो 86 : संजीव बधवार
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 30, 2026, 20:42 IST
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