60 ताल वाले नैनीताल में बचे गिनती के जलाशय: कैसे कलकल बहे शिप्रा, गर्मी के समय छह माह नदियों को देते थे जीवन

सिकुड़ती जा रही शिप्रा नदी के लिए कभी भवाली में जलस्रोत का सबसे बड़ा माध्यम वेटलैंड भी हुआ करता था। अंग्रेजी हुकूमत के समय तमाम जलाशयों को समेटे नैनीताल क्षेत्र के 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अंग्रेजों ने छखाता (षष्ठिखात) नाम तक दे दिया था। यहां के साठ जलाशय इस क्षेत्र को जल से परिपूर्ण रखते थे। यही जल शिप्रा को भी जीवन देता था और जंगल को नवजीवन। समय के साथ छकाता सिमटा तो अब गिनती के जलाशय ही सामने हैं। दो से तीन दशक पहले तक पानी से भरी शिप्रा नदी अब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रयास कर रही है। इन नदी का गायब जल तब वापस आएगा, जब भवाली से लेकर इस नदी के मुहाने पर आने वाले एक-एक जन महाभियान का हिस्सा बनेंगे। सरकार को भी दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। नदियों के जल स्रोत को फिर से तैयार करना होगा। कुमाऊं विवि के रिटायर्ड प्रोफेसर अजय रावत ने अपने अनुभव व इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए बताया कि नैनीताल क्षेत्र की अच्छी व्याख्या अंग्रेजी शासनकाल के दौरान लिखी गई किताबों में है। उस समय नैनीताल के 200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को छकाता नाम दिया गया था। इसमें भवाली भी आता था। छकाता का मतलब ही होता है साठ ताल। यानी इस क्षेत्र के सभी साठ ताल में छह माह तक बरसात का पानी भरा रहता था। इसी जल की वजह से भूजल भी बेहतर था। साल के बाकी छह महीनों में गर्मी के समय यही ताल शिप्रा नदी के जलस्रोत बनते थे। कलकल बहती नदी के किनारे तब भी गांव बसे हुए थे और कस्बे आबाद थे। बस अंतर यही है कि कस्बे बढ़ गए और नदी का दायरा सिमट गया। अब तो इन साठ तालों के नाम तक लोगों को याद नहीं होंगे। वर्तमान समय में सूखा ताल, अयार पाटा का जंगल, शेर का डांडा, पीवी सेनेटेरियम का क्षेत्र, नैनीताल, भीमताल आदि ही बचे हैं। जलाशय सूखने के साथ ही वन क्षेत्र में लगातार आवाजाही ने भी इस नदी पर असर डाला। निर्माण ने क्लाइमेट पर भी असर डाला और सभी मौसम आगे-पीछे हो गए। इसलिए शिप्रा आज पानी को तरस रही है। शिप्रा को बचाने के लिए करना होंगे ये काम (रिटायर्ड प्रोफेसर अजय रावत ने सुझाव दिया कि नदी को बचाने के लिए इन कार्यों का होना जरूरी है) नदी के रास्तों में चीड़ की जगह बांज और उतीश के पेड़ लगाने होंगे। नदी के किनारों पर पक्के निर्माण पर रोक लगाई जाए। नदी के अंदर किसी भी तरह का मलबा न जाए। नदी में सीवर या गंदगी न जाए। मूल जलस्रोत की तलाश कर इसे पुनर्जीवित किया जाए। नदी के रास्ते को रोकने वाले सारे व्यवधान समाप्त किए जाएं। लेक डेवलमेंट अथॉरिटी को सक्रिय करते हुए झीलें बचाने के लिए कार्य किया जाए।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 20, 2025, 02:13 IST
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