सियासत और सत्ता: बिहार का नया दौर, सम्राट के सामने चुनौती विराट
राजद से जदयू के रास्ते भाजपा तक पहुंचने वाले और दो बार उपमुख्यमंत्री रहे सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री चुने जाने के साथ ही बिहार की राजनीति में निस्संदेह एक नया दौर शुरू होने जा रहा है, जिसमें भाजपा पहली बार प्रत्यक्ष तौर पर राज्य का शासन संभालती नजर आएगी। गौरतलब है कि पिछले वर्ष का विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाते हुए ही लड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के चार महीने के भीतर ही नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा में जाने की इच्छा जताने के बाद स्थितियां बदल गईं, और राज्य की सत्ता में नेतृत्व बदलाव की राह खुल गई। अब तक राज्य के उपमुख्यमंत्री रहे सम्राट चौधरी की यह पदोन्नति विधानसभा चुनावों में राजग की शानदार जीत के बाद गृह मंत्रालय आवंटित किए जाने के कुछ महीनों बाद हुई है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन में एक अहम बदलाव का सूचक है। सम्राट चौधरी काफी समय से भाजपा के संगठन से जुड़े रहे हैं और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सरकार में मंत्री व उपमुख्यमंत्री के तौर पर उनके अनुभव और प्रशासनिक क्षमता को तरजीह देते हुए ही संभवत: उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया है। वह कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जो बिहार में ओबीसी का दूसरा सबसे बड़ा मतदाता समूह है। नीतीश कुमार खुद उन पर भरोसा जताते रहे हैं, जो गठबंधन की मजबूती को ही दर्शाता है। ऐसे में, सम्राट चौधरी का चयन जातीय संतुलन बनाए रखने, ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने और युवा व ऊर्जावान नेतृत्व को आगे लाने की भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा अधिक लगता है। पिछले बीस वर्षों में नीतीश कुमार की सरकार ने सड़क, बिजली, शिक्षा, महिलाओं के कल्याण और स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। राज्य में अपराध दर काफी घटी है और बुनियादी तंत्र मजबूत हुआ है। इसके बावजूद, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और उद्योग इत्यादि के क्षेत्रों में चुनौतियां मौजूद हैं। राज्य से पलायन भी रुका नहीं है। सम्राट चौधरी बतौर मंत्री राज्य की कानून-व्यवस्था को मजबूत करने में सक्रिय रहे हैं, लेकिन अब पूरे राज्य की जिम्मेदारी उन पर होगी। नवंबर, 2005 में नीतीश कुमार के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक उनके नाम दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का रिकॉर्ड है। जाहिर है कि उनके इस्तीफे से एक युग का अंत तो होगा ही, बिहार की राजनीति और लोकनीति में एक बड़ी खाली जगह भी पैदा होगी। नीतीश कुमार राज्य की नई सरकार को सहयोग देने की बात कह चुके हैं, फिर भी देखने वाली बात होगी कि नए मुख्यमंत्री उनकी खाली जगह को कैसे भरते हैं।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 15, 2026, 07:26 IST
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