रामकुमार कृषक की ग़ज़ल: वक़्त है वक़्त की तेज़ रफ़्तार है

वक़्त है वक़्त की तेज़ रफ़्तार है जो नहीं चल रहा वो गुनहगार है वक़्त को काटना है हंसी-खेल क्या वक़्त तो ख़ुद-ब-ख़ुद एक तलवार है बे-वफ़ा हो भले ज़िन्दगी मौत से मौत को ज़िन्दगी से बहुत प्यार है वक़्त को जाँच लें बाँच लें हाथ से अन्यथा व्यर्थ जाएगा अख़बार है वक़्त के हाथ में तो घड़ी ही नहीं हर घड़ी वक़्त की ही तलबगार है वक़्त है सिन्धु ख़ुद में घुमड़ता हुआ संग भाटा कभी तो कभी ज्वार है सिर्फ़ ख़ुद्दारियत ही ख़ुदा दोस्तो ! वक़्त भी है ख़ुदा पर निराकार है । हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें। लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएपचैनल से https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 14, 2026, 19:24 IST
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