RBI डिप्टी गवर्नर की चेतावनी: बैंकों में बढ़ता डिजिटलीकरण बदल रहा है वित्तीय जोखिमों का स्वरूप, नए उपाय जरूरी
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों के बीच नियामक ने जोखिम प्रबंधन को लेकर कड़ा संदेश दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे ने चेतावनी दी है कि बैंकों का तीव्र डिजिटलीकरण वित्तीय जोखिमों के स्वरूप को बदल रहा है। मुंबई में आयोजित कॉलेज ऑफ सुपरवाइजर्स के तीसरे वार्षिक वैश्विक सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पर्याप्त पूंजी और लिक्विडिटी अब बैंकों की सुरक्षा के लिए काफी नहीं है, बल्कि पर्यवेक्षकों को नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा। पूंजी से आगे सोचने की जरूरत डिप्टी गवर्नर ने कहा कि वर्तमान प्रौद्योगिकी-संचालित वातावरण में बैंकों की देखरेख के पुराने पैमाने पर्याप्त साबित नहीं हो सकते। बैंक आज नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनमें प्लेटफॉर्म-आधारित वितरण, भुगतान प्रणालियों में बदलाव और तेजी से बदलते अदृश्य खतरे शामिल हैं। घंटों में फैल सकता है संकट डिजिटल युग में जोखिमों बढ़ने की तेजी के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि अब जोखिम हफ्तों में नहीं, बल्कि घंटों में विकसित होते हैं। डिजिटल दुनिया में विकास के साथ-साथ तनाव भी उतनी ही तेजी से फैलता है। ग्राहकों की वृद्धि, गलत सूचना का प्रसार और तरलता (लिक्विडिटी) का संकट बहुत कम समय में विकराल रूप ले सकता है। इसके लिए पर्यवेक्षी प्रतिक्रियाओं को मजबूत करना होगा, जिसमें शुरुआती संकेतों की पहचान और त्वरित कार्रवाई शामिल है। साझा जोखिम और वेंडर्स पर निर्भरता बैंकिंग इकोसिस्टम में छिपे खतरों को उजागर करते हुए डिप्टी गवर्नर ने कहा कि कई संस्थान अक्सर एक ही तरह के सेवा प्रदाताओं, क्लाउड प्लेटफॉर्म, डेटा विक्रेताओं और साइबर सुरक्षा उपकरणों पर निर्भर होते हैं। इससे एक 'साझा जोखिम' उत्पन्न होता है जो पारंपरिक वित्तीय अनुपातों में दिखाई नहीं देता, लेकिन यह एक वास्तविक खतरा है। उन्होंने जोर दिया कि जोखिम का आकलन अब व्यक्तिगत संस्था के स्तर पर नहीं, बल्कि बैंकिंग इकोसिस्टम में 'एकाग्रता' के आधार पर करने की आवश्यकता है। एआई और साइबर सुरक्षा की चुनौतियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग के बढ़ते उपयोग पर उन्होंने कहा कि इससे कार्यकुशलता में सुधार तो होता है, लेकिन जवाबदेही और निष्पक्षता के नए सवाल भी खड़े होते हैं। वहीं, साइबर सुरक्षा के मोर्चे पर उन्होंने कहा कि डिजिटल बैंकिंग ने घुसपैठ के रास्ते बढ़ा दिए हैं। अब खतरा केवल सामान्य हैकर्स से नहीं, बल्कि संगठित और अच्छी तरह से वित्तपोषित समूहों से है। बैंक के आंतरिक नियंत्रण मजबूत होने के बावजूद किसी वेंडर या पार्टनर की एक कमजोरी भी पूरे सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है। ग्राहकों का विश्वास ही कुंजी डिप्टी गवर्नर ने अंत में ग्राहक सुरक्षा को सबसे ऊपर बताया बताया। उन्होंने डिजिटल ऋण में मिस-सेलिंग, डेटा के दुरुपयोग और आक्रामक वसूली के जोखिमों को रेखांकित किया। उन्होंने चेतावनी दी कि डिजिटल वातावरण में ग्राहक को होने वाला नुकसान जल्द ही विश्वास के मुद्दे में बदल सकता है, जो आगे चलकर बैंक के लिए तरलता की गंभीर समस्या बन सकता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 12, 2026, 19:46 IST
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