मुहिम: हर चौराहे पर बैठा खबरी, स्कूली बच्चों से भी करा रहे ये काम; साइबर ठगी का सेंटर बना जामताड़ा का करमाटांड

देश-दुनिया में साइबर ठगी के लिए बदनाम जामताड़ा जिले में करमाटांड कस्बा साइबर अपराध का केंद्र है। महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कर्मस्थली रहा यह इलाका अब साइबर ठगों के क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा है। पुलिस से बचने के लिए यहां साइबर ठगों ने हर चौराहे और गली में अपने खबरी बैठाए हैं। इतना ही नहीं, जब लोगों की जरूरत पड़ी तो ठगों ने स्कूली बच्चों को अपने गिरोह में भर्ती कर लिया। आलम यह है कि प्रशासन को दिन में अलग-अलग समय पर स्कूलों में बच्चों की हाजिरी लगाने के निर्देश देने पड़े। जब जामताड़ा से करमाटांड की ओर चलते हैं तो रास्ते में कई मंजिला मकान दिखते हैं। इन कोठीनुमा घरों के बड़े दरवाजे बंद मिलते हैं। इस क्षेत्र के लोग बात करने से कतराते हैं, लेकिन थोड़ा तैयार होने पर हर घर की सच्चाई बता देते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि नब्बे के दशक में रेल में चोरी, जहरखुरानी और छिनैती होना इस क्षेत्र के लिए आम बात थी। हालात यह थे कि बैगन ब्रेकिंग के नाम से यहां का रेलवे स्टेशन जाना जाता था। एक दशक पहले शुरू हुए साइबर ठगी के खेल ने एक और दाग लगा दिया है। इतना ही नहीं, कुछ अपराधी ऐसे भी पकड़े गए हैं, जिन पर पहले चोरी या लूट जैसे मुकदमे थे, लेकिन अब वे उसे छोड़ साइबर ठगी करने लगे हैं। इस इलाके से जुड़े हेठकरमांड, मट्टांड, झिलुआ, सियाटांड, पारटोल व सिदंरजोरी जैसे कई गांव साइबर ठगों के गांव के नाम से ही जाना जाने लगे हैं। कुख्यात ठग सीताराम मंडल भी करमाटांड ब्लॉक के गांव सिंदरजोरी का ही रहने वाला है। ये भी पढ़ें:-Defence: 'मौजूदा वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य चुनौतीपूर्ण, राजनाथ बोले- हर स्थिति के लिए तैयार रहें सुरक्षा बल गलियों में सीसीटीवी, ठगों ने दिहाड़ी पर रखे हैं युवा करमाटांड में अब तक दस से ज्यादा राज्यों की पुलिस छापे मार चुकी है। पुलिस और साइबर सेल ने जब शिकंजा कसा तो ठगों ने अपने सुरक्षा नेटवर्क को भी मजबूत बना लिया। यहां के लोग बताते हैं कि इन ठगों ने हर चौराहे पर बेरोजगारों या बुजुर्ग लोगों को बैठा रखा है। कुछ पैसे और मोबाइल रिचार्ज में ये लोग मुखबिरी करते हैं। जैसे ही पुलिस कस्बे में घुसती है तो यहे लोग साइबर ठगों को सतर्क कर देते हैं। कुछ चायवाले और नाई की दुकान वाले भी इसमें शामिल हैं। इतना ही नहीं, साइबर ठगों ने अपने घर के साथ-साथ पूरी गली में सीसीटीवी लगा रखे हैं। बड़े साइबर ठगों ने दिहाड़ी पर भी युवक रखे हैं। उन्हें रोजाना के 800 या 1,000 रुपये देते हैं और अपनी ओर से मोबाइल डाटा उपलब्ध कराते हैं। पकड़े जाने पर जेल यही युवा जाते हैं और असली ठेकेदार बच निकलता है। ऐसे बनाया जा रहा मोहरा साइबर ठगों ने गैंग बढ़ाने के लिए अलग तरीका अपनाया। ठग विशाल मंडल जब पुलिस के हत्थे चढ़ा तो उसने बताया कि स्कूली बच्चों को ट्रेंड करके उनसे साइबर ठगी करवाते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले निर्धन परिवारों के बच्चों को पैसा कमाने का लालच देकर साइबर ठगी कराई जाती है। रकम का बड़ा हिस्सा असली ठग के हिस्से में आता और कुछ स्कूली बच्चों में बांट दिया जाता है। पैसा आने पर बच्चों के परिजनों ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई। पकड़े जाने पर नाबालिग होने का फायदा मिलता। इसका सारा खर्चा भी मास्टरमाइंड ही उठाता है। बचाव में स्कूल में रजिस्टर में लगी हाजिरी को स्कूल में होने का सुबूत देकर पेश किया जाता। बच्चे सुबह हाजिरी लगाने के बाद स्कूल की दीवार फांद जंगल में साइबर ठगी करते हैं। ये भी पढ़ें:-Monsoon: पश्चिमी घाट में मानसून की तीव्रता में 800 वर्षों में बाद बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन का रहा बड़ा असर बच्चों को भी नहीं छोड़ा झारखंड के जामताड़ा जैसी जगह साइबर ठगी के केंद्र में यूं ही नहीं है। यहां बच्चों में थोड़ी समझ पैदा होते ही साइबर ठगी के गुर घरवाले ही सिखाने लगते हैं। स्कूली बच्चों से स्कूल छुड़वाकर बाकायदा ट्रेनिंग देते हैं। बच्चों को भी इस खेल का चस्का लगता है और वह जरायम की इस काली दुनिया में उतर जाते हैं। छोटे खाते साफ करने से शुरू हुआ उनका खेल अब डिजिटल अरेस्ट तक पहुंच रहा है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 04, 2025, 06:30 IST
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