'वोट बचाओ,देश बचाओ' रैली: रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन, 21 दलों ने भरी हुंकार, 'आप' ने बनाई दूरी

रामलीला मैदान में रविवार को हुई वोट बचाओ, देश बचाओ रैली के जरिये कांग्रेस ने विपक्षी राजनीति के केंद्र में लौटने की कोशिश की। बाराखंभा से रामलीला मैदान तक निकले मार्च में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी, नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और वामपंथी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने इसे व्यापक विपक्षी प्रदर्शन का रूप दिया। आयोजकों के मुताबिक, रैली में 21 दलों ने शिरकत की। हालांकि, आम आदमी पार्टी (आप) और तमिलनाडु डीएमके समेत कई अहम दल इससे दूर रहे। रैली का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), कथित वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग रहा। कांग्रेस ने इसे महज चुनावी प्रक्रिया का विवाद नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा सवाल बताया। विपक्षी दलों ने भी मतदाता सूची में बदलाव से बड़ी संख्या में मतदाताओं के प्रभावित होने की आशंका जताई। ऐसे में रैली से निकला सियासी संदेश आरोपों से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और भरोसा बहाल करने की मांग के रूप में सामने आया। यूपी में समझौता हुए बगैर भी साथ आए अखिलेश रैली में अखिलेश यादव की भागीदारी के खास सियासी मायने हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी खुद को प्रदेश की प्रमुख विपक्षी ताकत मानती है और कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर उसकी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। दोनों दलों का अपना अलग राजनीतिक आधार भी है। इसके बावजूद राहुल गांधी और खरगे के साथ मंच साझा करना बताता है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया का सवाल सपा के लिए भी महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी की मौजूदगी भी इसी लिहाज से अहम रही। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ उनकी राजनीतिक खींचतान कई बार सार्वजनिक हो चुकी है। इसके बावजूद रैली में उनकी भागीदारी ने चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर साझा चिंता को सामने रखा। वामपंथी दलों, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के नेताओं की मौजूदगी ने इस एकजुटता का दायरा और बढ़ाया। इसके जरिये विपक्ष ने संदेश देने की कोशिश की कि चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं हैं। आप की गैरमौजूदगी मुद्दे से ज्यादा सियासी मजबूरी अहम रैली में आप की गैरमौजूदगी भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही। कांग्रेस और आप के बीच दूरी की वजह केवल मुद्दों पर मतभेद नहीं, बल्कि चुनावी परिस्थितियां भी हैं। पंजाब में दोनों दल प्रमुख राजनीतिक ताकतें हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में उनके बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है। ऐसे में दिल्ली में कांग्रेस के मंच पर आप की मौजूदगी पंजाब की राजनीति में उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है। दोनों दल पहले गठबंधन की राजनीति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अलग-अलग चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ भी उतरे हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने इसी दौरान सिख दंगा पीड़ितों के हक में आवाज उठाई। चुनावी नजरिए से दोनों मसले बेहद संवेदनशील हैं। हालांकि, चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर आप का रुख काफी हद तक कांग्रेस के रुख से मिलता-जुलता रहा है। सियासी पंडित मानते हैं कि चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर समर्थन और किसी राजनीतिक गठबंधन के मंच का हिस्सा बनना अलग-अलग बातें हैं। जरूरी नहीं कि मुद्दे से सहमत होने के बाद भी सभी दल बड़े मौके पर साथ भी दिखें। नेहा मौजूद, समर्थन के बावजूद सीजेपी की तिकड़ी गायब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने रैली का समर्थन किया, लेकिन उसके संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका इसमें शामिल नहीं हुए। दिपके ने ममता बनर्जी से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया था कि पार्टी आंदोलन के साथ है, लेकिन अपनी स्वतंत्र और तटस्थ पहचान बनाए रखने के लिए औपचारिक रूप से रैली में शामिल नहीं होगी। दूसरी तरफ आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा न सिर्फ रामलीला मैदान पहुंची, बल्कि अपने अंदाज में मंच से रैली में जोश भी भरा।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 01, 2026, 15:39 IST
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