शाहिद कबीर की ग़ज़ल: ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया
ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया किसी के हाथ से निकला हुआ वो तीर हूँ जो हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया भुला दिया तो भुलाने की इंतिहा कर दी वो शख़्स अब मिरे वहम ओ गुमान से भी गया तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया पराई आग में कूदा तो क्या मिला 'शाहिद' उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 25, 2026, 19:23 IST
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