ईरान-अमेरिका युद्ध पूरी दुनिया को निगल जाएगा?: ट्रंप की रणनीति पर उठे सवाल, बढ़ा वैश्विक संकट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पश्चिम एशिया में संसदीय सहमति के बगैर युद्ध शुरू करने से भी ज्यादा बुरी बात यह है कि अब वह इस युद्ध पर से अपना नियंत्रण खोते जा रहे हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान नीति को लेकर वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से बेहद नाराज हैं, क्योंकि उनके शीर्ष सलाहकार आगे की रणनीति पर किसी साझा निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। युद्ध ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां संघर्ष बढ़ाने से क्षेत्रीय युद्ध के वैश्विक संकट में बदलने का खतरा है, जबकि मौजूदा रणनीति बनाए रखने से अमेरिका के लिए रणनीतिक हार की आशंका बनी हुई है। दरअसल, ऐसी स्थिति की आशंका शुरुआत से ही थी। ट्रंप ने ऐसे देश से टकराव मोल लिया, जिसकी सैन्य और क्षेत्रीय क्षमता सद्दाम हुसैन के 2003 वाले इराक से कहीं अधिक मजबूत है, पर उसके अनुरूप सैन्य तैयारी नहीं की। ट्रंप को विश्वास था कि सीमित हवाई हमलों, आर्थिक दबाव व जनविद्रोह के सहारे वह एक क्रूर तानाशाह सरकार को गिरा देंगे। उन्होंने कई बार संकेत दिया कि ईरान में भी वेनेजुएला जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं। लेकिन, यह आकलन गलत साबित हुआ। जब शुरुआती रणनीति विफल हो गई, तब ट्रंप प्रशासन के पास कोई ठोस प्लान बी नहीं था, सिवाय इसके कि ईरान पर और बम गिराए जाएं और उससे घुटने टेकने की उम्मीद की जाए। ट्रंप के सार्वजनिक बयान भी इस रणनीतिक असमंजस को उजागर करते हैं। एक दिन उन्होंने नए हवाई हमलों का आदेश देते हुए कहा कि ईरान झुक जाएगा, और अगले ही दिन उन्होंने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि ईरान और अन्य क्षेत्रीय देशों के अनुरोध पर उन्होंने हमले रोकने का फैसला किया है। इन विरोधाभासी बयानों से साफ है कि वाशिंगटन के पास कोई स्थिर रणनीति नहीं है। दरअसल, असल चुनौती केवल युद्ध जीतने की नहीं, उस पर नियंत्रण बनाए रखने की है। लंबे समय तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति रहने के कारण अमेरिका इस सोच का आदी हो चुका है कि वह जब चाहे युद्ध शुरू कर सकता है और जब चाहे खत्म भी। पर, ईरान के साथ संघर्ष ने इस धारणा को चुनौती दी है। अगर बात इराक व अफगानिस्तान के युद्ध की करें, तो वे विनाशकारी जरूर थे, लेकिन उनका दायरा सीमित था। उनमें न तो विरोधियों के पास अमेरिकी ठिकानों को व्यापक नुकसान पहुंचाने की क्षमता थी और न ही युद्ध में दुनिया की दूसरी बड़ी शक्तियां सीधे तौर पर शामिल थीं। अब तस्वीर बदल चुकी है। दुनिया ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां विश्वयुद्ध की आशंका बढ़ रही है। चिंताजनक बात यह है कि हालात पर किसी का भी पूरा नियंत्रण नहीं दिखता, अमेरिकी राष्ट्रपति का भी नहीं। ईरान न केवल अमेरिकी ठिकानों पर प्रभावी हमले कर रहा है, बल्कि उसने पूरे क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों को भी लगातार निशाना बनाया है। तेल और गैस से जुड़ी महत्वपूर्ण ऊर्जा संरचनाओं पर हमले तथा होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। इसी बीच हूती विद्रोहियों की सक्रियता ने संघर्ष को लाल सागर तक फैला दिया है। खबर है कि सऊदी अरब अब हूती-नियंत्रित इलाकों पर बड़े पैमाने पर हमले की तैयारी कर रहा है। वहीं, यूक्रेन द्वारा कैस्पियन सागर में ईरानी जहाज पर हमला, रूस और चीन की संभावित सैन्य व खुफिया सहायता तथा रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, चीन द्वारा ईरान को सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की आपूर्ति की खबरें इस संघर्ष को व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदलती दिखाई देती हैं। यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका दो कड़वी सैन्य सच्चाइयों का सामना कर रहा है। पहली, ईरान ने यह दिखा दिया है कि अमेरिकी सैन्य ठिकाने पहले जितने अभेद्य नहीं रहे। इराक युद्ध के दौरान अल-कायदा के पास लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें नहीं थीं और सद्दाम हुसैन भी क्षेत्र में उतने प्रभावी हमले नहीं कर सके थे, जितने ईरान ने इस संघर्ष में किए हैं। बेशक, ईरान को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है। उसके कई वरिष्ठ सैन्य व राजनीतिक नेता मारे गए हैं। पर, अमेरिका और ईरान की युद्ध को लेकर मानसिकता अलग-अलग है। वाशिंगटन अपने सैनिकों व हथियारों के नुकसान को अत्यंत गंभीर मानता है, जबकि ईरानी शासन सत्ता और रणनीतिक उद्देश्यों की रक्षा के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि केवल शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर देने से निर्णायक जीत की उम्मीद अब तक पूरी नहीं हुई है। दूसरी, अमेरिका के इंटरसेप्टर मिसाइलों और अन्य उन्नत हथियारों का भंडार तेजी से घट रहा है। ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे पर विरोधाभासी दावे करता है। एक ओर वह कहता है कि उसके पास हथियारों की कोई कमी नहीं है, दूसरी ओर यह भी कहता है कि यदि कमी है, तो उसके लिए जो बाइडन जिम्मेदार हैं। इतिहास बताता है कि बड़े युद्ध अचानक नहीं शुरू होते। वे छोटे-छोटे सैन्य टकरावों, गलत राजनीतिक आकलनों और बढ़ते तनाव की शृंखला से जन्म लेते हैं। मुझे भरोसा है कि अमेरिकी सरकार और दुनियाभर की सहयोगी सरकारों में अब भी ऐसे समझदार लोग मौजूद हैं, जो स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। पर फिलहाल, लगभग हर संकेत यही बताता है कि तनाव घटने के बजाय पहले से अधिक तेज हो रहा है। मुझे नहीं लगता कि विश्वयुद्ध तय है और न ही मैं इसे सबसे संभावित नतीजा मानता हूं। लेकिन, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से आज इसकी आशंका पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है। ऐसे समय में अमेरिका की कमान उन नेताओं के हाथों में है, जिन्हें मैं आधुनिक अमेरिकी इतिहास के सबसे कमजोर शासकों में गिनता हूं। अमेरिकी कांग्रेस, जिसके पास राष्ट्रपति की शक्तियों पर सांविधानिक नियंत्रण रखने का अधिकार है, फिलहाल ट्रंप के सामने बेबस नजर आती है। रिपब्लिकन सांसदों पर प्राथमिक चुनाव हारने का दबाव इतना अधिक है कि राजनीतिक साहस पीछे छूटता दिख रहा है। सामान्यतः अमेरिकी मतदाता विदेश नीति को चुनावी मुद्दा नहीं मानते, पर वैश्विक संकट के समय यही उनके लिए सबसे अहम प्रश्न बन जाता है। ऐसे में, अमेरिका का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या जनता कांग्रेस को अपनी सांविधानिक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है। पर, इसके लिए लोकतंत्रों को वह करना होगा, जिसमें वे अक्सर असफल रहे हैं-आने वाले खतरे को समय रहते पहचानना और किसी विनाशकारी युद्ध के पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने से पहले निर्णायक कदम उठाना। ©The New York Times 2026
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 04, 2026, 05:37 IST
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