वैश्विक संघर्षों का दूसरा पहलू: युद्ध के धुएं में छिप रहा पर्यावरण का विनाश

पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच संघर्ष केवल रणनीतिक हानि तक ही सीमित नहीं, बल्कि एक ऐसी विषाक्त विरासत रच रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर युद्ध की धूल में दब जाती है। ब्रिटेन स्थित पर्यावरणीय शोध संस्था कॉन्फ्लिक्ट एंड एन्वॉयरन्मेंट ऑब्जर्वेटरी (सीईओबीएस) ने इस संघर्ष के शुरू होने के बाद से अब तक 300 से अधिक ऐसी घटनाओं की पहचान की है, जिनसे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा है। हालांकि, ईरान की करीब 5,000 जगहों को निशाना बनाने के अमेरिकी दावे को देखते हुए सीईओबीएस का आंकड़ा नुकसान का महज एक छोटा-सा हिस्सा ही दर्शाता है। इन जोखिमों का स्पष्ट संकेत तब मिला, जब इस्राइल द्वारा ईरान के तेल भंडारों पर किए गए हमलों के बाद तेहरान की सड़कें काली बारिश से भीग गईं। गौरतलब है कि ईरान के दक्षिणी प्रांतों में तेल रिफाइनरियों पर हुए हमलों से हजारों टन कच्चा तेल समुद्र में रिस रहा है और समुद्री जीवन को खत्म कर रहा है। यही नहीं, विस्फोटों का विषैला धुआं आसपास के क्षेत्रों में श्वास संबंधी बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ा रहा है। इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जा सकता कि तेल रिफाइनरियों पर हुए हमलों के गंभीर पर्यावरणीय परिणाम होंगे और लोगों के हवा, पानी और भोजन पर भी इसका असर पड़ेगा। शोध का यह बताना गंभीर है कि बमबारी से पैदा हुए जहरीले प्रदूषक वर्षों तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं और आसपास के समुदायों में फैल भी सकते हैं। गोला-बारूद में जिस टीएनटी नामक विस्फोटक का उपयोग होता है, जिसे अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) तक ने संभावित कैंसरकारक माना है, युद्ध खत्म होने के बाद भी मिट्टी में बना रह सकता है। बात सिर्फ इसी युद्ध की नहीं है। एक अन्य ब्रिटिश अध्ययन बताता है कि इस्राइल-गाजा संघर्ष में भी अब तक तीन करोड़ टन से भी अधिक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो चुका है। ऐसा नहीं है कि युद्ध और पर्यावरण के मसले पर अंतरराष्ट्रीय नियम कुछ नहीं कहते। जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल में पर्यावरणीय क्षति को भी युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा गया है। यह दुखद है कि संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस जैसी संस्थाओं की आवाज महाशक्तियों की राजनीति में दब गई है। जब मिसाइलें खामोश हो जाती हैं, तब भी पर्यावरण में छिपे घाव लंबे समय तक बने रहते हैं। यह युद्धों की अदृश्य कीमत होती है। यह विषाक्त चक्र हमें निगल ले, इससे पहले इसका टूटना जरूरी है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 14, 2026, 04:03 IST
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