हालात: ईरान का भविष्य अंधकारमय ही है, निर्मूल नहीं आशंकाएं

अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले के चलते ईरान पर लगातार बम गिराए जा रहे हैं। जैसा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, शनिवार को शुरू हुए हमलों के घोषित उद्देश्य ईरानी शासन को पलटना, उसकी सेना को नष्ट करना और उसकी परमाणु क्षमता को समाप्त करना है। लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं है कि भले ही अमेरिका और इस्राइल इन घोषित लक्ष्यों को हासिल कर लें, फिर भी ईरानियों को निकट भविष्य में शांति और स्थिरता मिलने वाली नहीं है। एक वीडियो संदेश में, ट्रंप ने ईरानियों से कहा कि आपकी आजादी की घड़ी आ गई है, और जब अमेरिका अपना काम पूरा कर लेगा, तो 'सरकार आपकी होगी। लेकिन ईरान के एक अधिक स्वतंत्र समाज के रूप में उभरने, और करोड़ों ईरानियों के रहने के लिए सही जगह बनने की संभावना कम ही है। आगे क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन, इतिहास बताता है कि सैन्य अभियान के बाद जिन देशों पर हमला हुआ, उनके साथ क्या हुआ, और हम उनसे सबक ले सकते हैं। वर्ष 2019 में, रैंड कॉरपोरेशन ने एक अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य दखल के सैकड़ों मामलों की पड़ताल की गई। लेखकों ने तीन बड़े कारकों की पहचान की, जो यह तय करते हैं कि जिस देश पर हमला किया जाता है, वह अंततः बेहतर स्थिति में रहता है या नहीं। पहली वजह थी पहले से मौजूद जातीय और धार्मिक तनाव। अमेरिकी हमले के बाद इराक में अफरा-तफरी की एक बड़ी वजह यह थी, और इसी वजह से जापान को दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक एकता वापस लाने में मदद मिली। पश्चिम एशिया के ज्यादातर देशों के मुकाबले, ईरान लंबे समय से काफी हद तक एकजुट समाज रहा है, जिसका एक कारण सदियों से स्थिर रही सीमाएं हैं। पर इस्लामी गणराज्य द्वारा जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ 47 साल की सरकारी हिंसा ने लंबे समय से दबी हुई दरारों को जगा दिया है, जिससे हमले के बाद सांप्रदायिक खून-खराबे का खतरा काफी बढ़ गया है। दूसरी वजह थी भरोसेमंद राजनीतिक संस्थाओं का होना, खासकर सक्रिय सरकारी एजेंसियां जो देश को स्थिर कर सकें या युद्ध के समय मानवीय राहत का संचालन कर सकें। ईरान में, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुनियोजित तरीके से खोखला करना और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली वर्ग पर लोगों के गहरे अविश्वास ने उन ढांचों को काफी हद तक बेअसर बना दिया है। तीसरी वजह थी-आर्थिक मजबूती। आज ईरान की अर्थव्यवस्था बहुत नाजुक है। महंगाई 70 फीसदी से ज्यादा हो गई है। अकेले 2025 में ही मुद्रा की कीमत 84 फीसदी कम हो गई। यह सब बिगड़ते पर्यावरण संकट से और बढ़ गया है। हर तरह से, ईरानी अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर है। रैंड रिपोर्ट के लेखकों ने जर्मनी और जापान जैसी जगहों पर दखल के उदाहरणों की तुलना लीबिया, इराक और सीरिया में दखल से की, ताकि यह दिखाया जा सके कि इन वजहों ने नतीजों को कैसे प्रभावित किया। आज ईरान दूसरे समूह में आ सकता है, जिसने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद अफरा-तफरी, संघर्ष और नागरिक ढांचों को टूटते हुए देखा। बहुत संभव है कि ट्रंप शायद सरकार के शीर्ष पर बैठे खास सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व को हटाने में कामयाब हो जाएं, जीत की घोषणा कर दें और फिर फैली अफरा-तफरी का इल्जाम ईरानियों पर डाल दें। शायद वह अपने अगले एजेंडे की तरफ बढ़ जाएंगे और ईरानियों को एक बर्बाद देश में जिंदा रहने के लिए छोड़ दिया जाएगा। ईरान में सैन्य दखल के बारे में मेरे नकारात्मक नजरिये को, हर तरह के विदेशी दखल के विरोध के रूप में नहीं समझना चाहिए। कुछ आकलनों से पता चलता है कि जनवरी में प्रदर्शनों के दौरान दो दिनों में सरकार ने हजारों निहत्थे लोगों को मार डाला होगा, और हिंसा फिर भी खत्म नहीं हुई। इसके अलावा हजारों आम लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से ज्यादातर बच्चे थे। कई लोगों को लंबी जेल की सजा हो सकती है। कुछ को मौत की सजा हो सकती है। यह हिंसा इस्लामी गणराज्य के बुनियादी नियमों से उतनी अलग नहीं है, जितनी कि उन्हीं की ओर वापसी है। 1980 के दशक में, जब सरकार को अपने वजूद पर खतरा महसूस हुआ, तो उसने भी इसी तरह सख्ती से जवाब दिया। लगभग आधी सदी से, ईरान के नेता अपने वजूद पर आए खतरों का जवाब ईरानी लोगों के खिलाफ भारी हिंसा से देते रहे हैं। इतनी बड़ी लड़ाई शुरू या खत्म करने का फैसला करना आम लोगों के हाथ में नहीं होता, और इराक से लेकर गाजा तक का हालिया इतिहास बताता है कि ऐसे समय में सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शन वाशिंगटन और दूसरी जगहों पर फैसला लेने वालों पर कोई असर नहीं डालते। ऐसी निराशा की स्थिति में ईरानियों और दुनिया को ईरानी लोगों की भलाई और सुरक्षा को विचारधारा से ज्यादा जरूरी बनाना चाहिए, और उसके लिए मिलकर ठोस कदम उठाने चाहिए। विपक्षी पार्टियों और निर्वासित समूहों को ईरान वापस लौटने के लिए अभियान चलाने चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे फलस्तीनी लोगों ने चलाया है। जैसे ही बमबारी बंद हो, निर्वासित लोगों की वापसी के लिए अभियान चलाने चाहिए। देश से निकाले गए कई ईरानी बहुत काबिल डॉक्टर, इंजीनियर और दूसरे पेशेवर हैं, जो सरकारी एजेंसियों के काम न करने पर, देश को स्थिर करने और दुख कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उनके लौटने से बचे हुए सरकारी सुरक्षा बलों के लिए सत्ता पर अपनी पकड़ फिर से मजबूत करना मुश्किल हो जाएगा। यह ईरानी लोगों के लिए भी एक बड़ा मौका होगा, जो खुद गुस्से और आपसी संघर्ष में बंटे हुए हैं, ताकि वे देश के लिए काम कर सकें। इस युद्ध का नतीजा चाहे जो भी हो, देशों को आर्थिक पाबंदियों को तेजी से हटाने के लिए एक वैश्विक अभियान का समर्थन करना चाहिए, जिसने ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग कर दिया था। इन पाबंदियों ने सरकार को कमजोर करने के बजाय मजबूत ही किया। इन्हें हटाने से कम से कम आम ईरानियों पर इस नई लड़ाई के बुरे असर को कम करने में मदद मिलेगी, जिन्हें इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ेगा, और आने वाले दिनों में नष्ट होने वाले जरूरी बुनियादी ढांचे को फिर से बनाने में मदद मिलेगी। ईरानियों को एक नए तरह के अंतरराष्ट्रीयतावाद की जरूरत है। आम ईरानियों की वैश्विक मामलों में ज्यादा दखल होनी चाहिए। शुरुआत करने के लिए ईरान किसी भी दूसरी जगह जितना ही अच्छा है। -©The New York Times 2026

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 02, 2026, 03:25 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




हालात: ईरान का भविष्य अंधकारमय ही है, निर्मूल नहीं आशंकाएं #Opinion #National #WestAsiaTensions #Iran #Bleak #Us-iranWar #Israel #SubahSamachar