भाजपा का भविष्य: बदलाव दिख रहा है, और चुनौतियों से निपटने की तैयारी भी
नितिननवीन सिन्हा ने भारतीय जनता पार्टी के बारहवें अध्यक्ष के रूप में कमान संभाल ली है, जिन्हें निवर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा से एक ऐसी पार्टी विरासत में मिल रही है, जिसने विगत वर्षों में अभूतपूर्व तरीके से विस्तार किया है। 45 वर्षीय नितिन नवीन के पार्टी के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने को एक व्यापक संगठनात्मक बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसका उद्देश्य नेताओं की एक नई पीढ़ी को बढ़ावा देना है। नितिन बिहार से पांच बार के विधायक और पूर्व मंत्री रहे हैं, जिन्हें अब से पहले बिहार से बाहर बहुत कम जाना जाता था। यही वजह थी कि जब पिछले महीने भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति हुई, तो इसे एक चौंकाने वाले निर्णय के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी सहित यदि भाजपा के तमाम नेता यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी में एक साधारण कार्यकर्ता भी अपने काम और समर्पण के दम पर शिखर तक पहुंच सकता है, तो नितिन नवीन उसकी मिसाल हैं। नितिन दिवंगत वरिष्ठ भाजपा नेता नबल किशोर सिन्हा के पुत्र हैं। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से की और फिर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव और बिहार अध्यक्ष भी रहे। वह सिक्किम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में संगठन प्रभारी भी रहे। ऐसे समय, जब तमाम राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को लेकर सवाल उठते हैं, विभिन्न पार्टियों के लिए नितिन नबीन की ताजपोशी एक मिसाल हो सकती है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से सरकार चला रही भाजपा अब भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रही है। नितिन नवीन की उम्र और पृष्ठभूमि पार्टी को युवा पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम बन सकती है। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि वह एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, जो जेन-जी मतदाताओं के बीच काम कर रही है, लेकिन जिसकी संरचना जेन-एक्स जैसी है। ऐसे में, भाजपा के पदाधिकारियों के चयन में युवा व अनुभवी नेताओं का सही संतुलन बनाए रखना भी उनके लिए चुनौती है। उन्होंने ऐसे समय में पार्टी की कमान संभाली है, जब इस वर्ष पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भाजपा आज तक जीत हासिल नहीं कर सकी है। इसके अतिरिक्त संसद में महिला आरक्षण, 2027 में प्रस्तावित जाति जनगणना, प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी वन नेशन, वन इलेक्शन योजना की शुरुआत के अलावा 2029 के चुनावों की तैयारियों की चुनौती भी होगी, क्योंकि तब तक परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी होगी। लिहाजा उनकी रणनीतिक और सांगठनिक क्षमता की जल्द ही परीक्षा होगी।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 21, 2026, 04:01 IST
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