जब दवा ही मर्ज बन जाए: दवाएं केवल चर्बी ही नहीं घटातीं, बल्कि मांसपेशियों को भी कमजोर कर सकती हैं
आजकल अखबारों की सुर्खियों में एक दवा है- सेमाग्लूटाइड, जिसका पेटेंट खत्म हो चुका है। भारत में मूलतः डायबिटीज के इलाज के लिए स्वीकृत यह दवा, वजन घटाने में भी सहायक मानी जाती है। लेकिन भारतीय उपभोक्ता बाजार की प्रवृत्ति को भांपते हुए, इस दवा को अब 'अफोर्डेबल वजन घटाने वाली दवा' के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। निश्चित रूप से आज भारत मोटापे और उससे जुड़ी मेटाबोलिक बीमारियों- जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर और डिस्लिपिडेमिया के बढ़ते बोझ से जूझ रहा है। लगभग हर चौथा भारतीय मोटापे का शिकार है। हर दस में से एक वयस्क मधुमेह से पीड़ित है, जबकि तीन में से एक को उच्च रक्तचाप है। बड़ी संख्या में लोगों में फैटी लिवर की समस्या भी है। इससे भी अधिक चिंता की बात है कि बच्चों में मोटापा और वजन तेजी से बढ़ रहा है। इन सबके कारण भी ज्ञात हैं। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का बढ़ता प्रसार, शहरी जीवनशैली के कारण घटती शारीरिक सक्रियता, खुले स्थानों की कमी, लगातार तनाव, शराब का सेवन और अपर्याप्त नींद, ये सभी इस संकट को जन्म दे रहे हैं। इसके साथ ही, भारतीयों में एक आनुवंशिक प्रवृत्ति भी है, जिसमें दिखने में पतले होने के बावजूद शरीर में वसा अधिक होती है। इसे भारतीयों की 'थिन-फैट' प्रवृत्ति कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से, एक ऐसे समाज में, जहां लंबे समय तक कुपोषण रहा, वहां अधिक वजन को कभी समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। इसलिए, जब पिछले दो दशकों में मोटापा बढ़ा, तो इस पर चर्चा अपेक्षाकृत धीमी और संकोचपूर्ण रही। फिर दवाओं का दौर आया। पिछले वर्ष वजन घटाने की एक नई दवा भारतीय बाजार में आई और तेजी से बिकने वाली दवाओं में शामिल हो गई। इसकी सफलता ने न केवल चिकित्सकीय मांग को उजागर किया, बल्कि एक बड़े और लाभकारी बाजार के उभरने का संकेत भी दिया। अब जब सेमाग्लूटाइड कम कीमत पर उपलब्ध है, तो इसे तेजी से वजन घटाने के समाधान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। बीते एक वर्ष में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति उभरी है। प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का सीधा विज्ञापन प्रतिबंधित है, पर दवा कंपनियां 'सरोगेट विज्ञापन' के माध्यम से इस सीमा को पार करती रहीं। मोटापे को केंद्र में रखते हुए दवा कंपनियों के नाम से अखबारों में पूरे पन्ने के विज्ञापन, शहरों में बड़े-बड़े होर्डिंग, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा अप्रत्यक्ष प्रचार और प्रायोजित लेख-ये सभी जनमानस को प्रभावित करते हैं। यह धीरे-धीरे जन अपेक्षाओं और चिकित्सकीय व्यवहार को प्रभावित करता है। सरकारी नियामक एजेंसियों ने इन्हें अनदेखा किया और जब तक इस पर रोक लगी, तब तक दवा कंपनियों का उद्देश्य पूरा हो चुका था। ऐसे माहौल में, वैज्ञानिक प्रगति और व्यावसायिक हितों के बीच की रेखा धुंधली लगती है। नई दवाओं को अक्सर ही क्रांतिकारी समाधान के रूप में पेश किया जाता है, जबकि उनके दुष्प्रभाव पर कम ध्यान दिया जाता है। इससे मोटापा जैसी जटिल समस्याएं भी दवाओं से आसानी से हल होने वाली प्रतीत होती हैं। अब जैसे कि सेमाग्लूटाइड और अन्य जीएलपी-1 आधारित दवाएं केवल चर्बी ही नहीं घटातीं, बल्कि मांसपेशियों को भी कमजोर कर सकती हैं, जिसे सारकोपेनिया कहा जाता है। सारकोपेनिया सिर्फ सैद्धांतिक चिंता नहीं रही, बल्कि शोध और वास्तविक अनुभव इसे प्रमाणित करते हैं। लेकिन वजन घटाने के उत्साह में इस जोखिम को नजरअंदाज किया जाता है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति का वजन तो कम होता है, पर उसकी ताकत और दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। लेकिन फार्मा कंपनियों के लिए यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। इन दवाओं के एक साइड इफेक्ट सारकोपेनिया के इलाज के लिए नई दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। आने वाले कुछ वर्षों में, जब लोग इन दवाओं का इस्तेमाल करेंगे, तो उनका मोटापा तो कम हो जाएगा, लेकिन सारकोपेनिया के इलाज के लिए नई दवाएं लेने की जरूरत पड़ सकती है। भारत की नियामक व्यवस्था पहले ही अत्यधिक चिकित्साकरण को बढ़ावा दे चुकी है। दरअसल, मोटापे का इलाज दवाओं में नहीं, बल्कि जीवनशैली में है। हम एक ऐसे चक्र को देख रहे हैं, जहां एक दवा दूसरी दवा के लिए बाजार बनाती है और हर नया समाधान पिछले के दुष्प्रभावों को संभालने के लिए आता है। इस संदर्भ में, चिकित्सा संगठन भी अप्रत्यक्ष व गलत भूमिका निभाते नजर आते हैं। आजकल क्लिनिकल दिशानिर्देश तेजी से अपडेट हो रहे हैं और नई दवाओं को जल्दी शामिल किया जा रहा है। इससे उनका व्यापक उपयोग और व्यावसायिक सफलता लगभग सुनिश्चित हो जाती है। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या ये सिफारिशें हमेशा ठोस साक्ष्यों पर आधारित होती हैं। दूसरी ओर, मोटापे के सबसे बड़े कारणों में से एक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के विस्तार पर कम ध्यान दिया जाता है। भारत में इस क्षेत्र की वृद्धि तेज रही है। ये उत्पाद लोगों की खान-पान की आदतों को बदल रहे हैं, पर नीतिगत स्तर पर ठोस कदम अब भी सीमित हैं। हम एक विरोधाभासी व्यवस्था में जी रहे हैं। एक उद्योग ऐसी जीवनशैली को बढ़ावा देता है, जो बीमारियां पैदा करती है। दूसरा उद्योग उन बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं बेचता है। और फिर एक उद्योग दवाओं के दुष्प्रभावों के इलाज के लिए तैयार हो रहा होता है। बाजार के नजरिये से यह लाभकारी है, पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह असंतुलित है। मूल प्रश्न यह है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं-क्या हम एक स्वस्थ समाज बना रहे हैं या एक अधिक दवा-निर्भर समाज स्वास्थ्य की अवधारणा को पुनः स्थापित करने के लिए दृष्टिकोण बदलना होगा। दवाएं महत्वपूर्ण हैं, पर वे मूलभूत उपायों का विकल्प नहीं हो सकतीं। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। दवाओं के लाभ के साथ उनके जोखिमों पर भी पारदर्शिता जरूरी है। स्वास्थ्य के चिकित्साकरण को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। स्वास्थ्य की तलाश में दवा और बाजार-निर्भरता के एक और चक्र की शुरुआत हो जाए, तो हम स्वास्थ्य के वास्तविक अर्थ से भटक सकते हैं। एंटी-ओबेसिटी दवाएं अंतिम समाधान नहीं हैं, बल्कि एक संकेत है कि चिकित्साकरण हमारे जीवन में कितनी गहराई तक प्रवेश कर चुका है। यह समय है ठहरकर सोचने का और स्वास्थ्य को पुनः परिभाषित करने का, इससे पहले कि दवाएं ही इसे परिभाषित करने लगें। -edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 26, 2026, 05:37 IST
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