महाराष्ट्र के स्थानीय चुनाव में महारथी बनकर उभरी भाजपा, ठाकरे साम्राज्य पर प्रश्नों का पहाड़
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के ठीक एक साल बाद बीएमसी समेत नगर निगमों के चुनाव में हुई भारी जीत पर यदि भाजपा-शिंदे सेना गठबंधन फूला नहीं समा रहा, तो इसे समझा जा सकता है, क्योंकि जिन 29 स्थानीय निकायों में मतदान हुए, उनमें से अधिकांश में महायुति ने जीत दर्ज कर जमीनी स्तर पर अपना दबदबा दिखाते हुए ठाकरे बंधुओं और पवार की योजना पर पानी फेर दिया है। हैरान करने वाला प्रदर्शन तो असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम का रहा, जिसने न सिर्फ समाजवादी पार्टी को पीछे छोड़ दिया, बल्कि कई जगहों पर कांग्रेस को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। भाजपा और शिवसेना के 227 सदस्यों वाली बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में जीत का मतलब है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) 25 वर्षों में पहली बार इस नगर निकाय की सत्ता में नहीं होगी। इन नतीजों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा ने महाराष्ट्र की राजनीति में न केवल अपना सिक्का जमा लिया है, बल्कि विपक्ष को भी किनारे लगा दिया है, जो 2024 के विधानसभा चुनावों में मिली हार से अब तक उबर नहीं सका था। भाजपा के इस दबदबे का मतलब है कि अब उसका प्रभाव केवल नागपुर या कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में फैल गया है। ये नतीजे न केवल विपक्ष को आत्ममंथन करने का संदेश देते हैं, बल्कि उसके सहयोगियों के लिए भी संकेत है कि अब उन्हें भाजपा को अपना बड़ा भाई मानने से कोई संकोच नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में, जब ठाकरे बंधुओं और पुणे व पिंपरी-चिंचवड़ में पवार एवं उनके भतीजे की एकजुटता भी काम नहीं कर पाई, तो विपक्ष के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि अब उनकी रणनीति क्या होगी। इन नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि मराठी वोट बैंक ठाकरे बंधुओं के हाथ से निकल गया है, जिनके समर्थक अक्सर उत्तर भारतीय लोगों के साथ दुर्व्यवहार पर उतर आते थे। देश के सबसे समृद्ध नगर निगम पर जिस दल का नियंत्रण होता है, वही मुंबई की राजनीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाता है और अक्सर राज्य की राजनीति की दिशा को भी प्रभावित करता है। इस लिहाज से महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों ने भाजपा को राज्य की राजनीति में महारथी बना दिया है। नतीजों से निस्संदेह ठाकरे बंधुओं और पवार परिवार की रणनीति की कमजोरियां उजागर हुई हैं और मतदाताओं के साथ उनके जमीनी जुड़ाव पर प्रश्नचिह्न भी लगा है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 17, 2026, 06:27 IST
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